कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया!

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Commander Arjun Singh Bhadauria

मौजूदा समाजवादी पार्टी के संस्थापक, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव जी के राजनीतिक गुरु थे, महान स्वतंत्रता सेनानी एवं अग्रणी समाजवादी नेता, कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया । मुलायम सिंह यादव जी ने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया और नथू सिंह के सान्निध्य में काम किया और सोशलिस्ट विचारधारा को गहराई से समझा , सीखा । कमांडर भदौरिया ने ही मुलायम सिंह जी को राजनीति की बारीकियां सिखाईं और उन्हें आगे बढ़ाया ।

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भदौरिया जी ने 1940 के दशक में मध्य भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध भूमिगत प्रतिरोध आंदोलन का नेतृत्व किया । भारत की स्वतंत्रता से पहले और बाद में, अर्जुन सिंह भदौरिया को उनकी राजनीतिक सक्रियता के लिए कई बार जेल जाना पड़ा । उन्हें उनके जीवन भर के साथियों आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण द्वारा स्वतंत्रता संग्राम में उनकी अग्रणी भूमिका के सम्मान में ‘ कमांडर साहब ‘ या ‘ माननीय कमांडर ‘ के उपनाम से जाना जाता था । अर्जुन सिंह भदौरिया ने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में किसानों और कृषि प्रधानों के अधिकार के लिए अपना संघर्ष जारी रखा । उन्होंने 1940 के दशक में न केवल इटावा जनपद बल्कि सीमावर्ती जिलों को भी आजादी की संघर्ष चेतना से ऐसा जोड़ा कि घर-घर में आजादी का बिगुल बज उठा ।

10 मई 1910 को बसरेहर के लोहिया गांव में जन्मे अर्जुन सिंह भदौरिया ने 1942 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था । 1942 में उन्होंने सशस्त्र लालसेना का गठन किया । बिना किसी खून खराबे के अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए ।

1940 के दशक में, कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने तीन साल ( 1941 – 44 ) तक चंबल की घाटियों के किनारे , यमुना के किनारे रहने वाले ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाते हुए एक सशस्त्र समूह लाल सेना का गठन किया था । उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सेना की तर्ज पर भारत छोड़ो आंदोलन के समय लाल सेना बनाने के बाद ‘ कमांडर ‘ की उपाधि पायी ।

आजादी के योद्धा कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने चंबल घाटी में हजारों क्रांतिकारियों को ट्रेनिंग देकर फिरंगी सरकार की चूलें हिलाने के लिए सशस्त्र क्रांति का सबसे उम्दा प्रयोग किया था । करो या मरो आंदोलन के दौरान कमांडर को 44 वर्ष की सजा हुई और अपने पूरे जीवनकाल में वह करीब 52 बार जेल गये ।

उन्होंने दो स्तरों पर काम किया – एक ओर वे एक गांधीवादी थे, लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने लाल सेना की स्थापना की, जिसने लोगों को राजस्व, खाद्यान्न और हथियार जैसी ब्रिटिश संपत्ति लूटने के लिए प्रशिक्षित किया । जबकि पैसे और हथियारों का कुछ हिस्सा समूह चलाने और खाद्यान्न खरीदने के लिए इस्तेमाल किया गया था, शेष पैसे का इस्तेमाल गरीबों को खिलाने के लिए किया गया था ।

अर्जुन सिंह के साहस से ब्रिटिश शासन तंग आ चुका था । लिहाजा जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो उन्हें बेडिय़ों से बांधकर रखा गया था । कोर्ट में मुकदमा चला और उन्हें 44 साल की कड़ी सजा सुनाई गई । आचार्य नरेंद्र देव चंबल के इस क्रांतिकारी संगठन से प्रभावित हुए और उन्होंने ही पहली बार अर्जुन सिंह भदौरिया को ‘कमांडर ‘ कहकर संबोधित किया ।

आजाद भारत में कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया 1957, 1967 और 1977 में इटावा से लोकसभा सांसद चुने गये । इटावा मे शैक्षिक पिछड़ेपन की समस्या, आवागमन के लिए पुलों का अभाव जैसी तमाम सरोकारी समस्याओं को वे सदन में प्रमुखता से उठाते रहे । कमांडर ने इसी जज्बे से आजाद भारत में आपातकाल का जमकर विरोध किया । तमाम यातनाओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी । जिससे प्रभावित क्षेत्र की जनता ने सांसद चुन कर उन्हे सर आंखों पर बैठाया । उन्होंने किसान पंचायत के संगठन में विशेष रुचि ली और स्वामी भगवान, गेंदा सिंह, मुलखी राज, सूरजदेव, रामधारी शास्त्री और बलवान सिंह के साथ मिलकर सशक्त किसान आंदोलन खड़ा किया ।

लाल सेना के जन्मदाता कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया की पत्नी सरला भदौरिया को 1964 में डा. राममनोहर लोहिया ने राज्यसभा में भिजवाया । सरला जी के बेटे सुधींद्र भदौरिया बताते हैं कि 1964 में उनकी मां सरला भदौरिया को राम मनोहर लोहिया ने राज्यसभा चुनाव के लिए मैदान में उतारा था । सरला के चुनाव संचालन की व्यवस्था दिग्गज समाजवादी राजनारायण ने देखी थी, इसी वजह से उनकी मां की जीत संभव हुई । सरला को समाजवादी विचारधारा की पहली महिला राज्यसभा सदस्य कहा जाता है । सरला वर्ष 1964 से 1970 तक राज्यसभा सांसद और बाद में 1977- 80 तक उत्तर प्रदेश महिला समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष चुनी गईं ।


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