— अम्बेदकर कुमार साहु —
प्रस्तुत आलेख हालिया अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक घटनाक्रमों के माध्यम से उत्तर-औपनिवेशिक वैश्विक व्यवस्था में निर्मित होने वाले विमर्शों को एडवर्ड सईद के ‘प्राच्यवाद’ (Orientalism), एंटोनियो ग्राम्शी के ‘सांस्कृतिक हेजेमनी’ (Cultural Hegemony) और मिशेल फूको के ‘ज्ञान और शक्ति’ (Knowledge/Power) जैसे प्रमुख समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के माध्यम से पाश्चात्य देशों की भारत के प्रति औपनिवेशिक मानसिकता को उजागर करने का प्रयास करता है। शोध यह तर्क देता है कि पश्चिमी जगत द्वारा ‘लोकतांत्रिक मानदंडों’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर निर्मित किए जाने वाले समकालीन विमर्श वास्तव में कोई तटस्थ मूल्य नहीं हैं, बल्कि वे गैर-पश्चिमी समाजों पर अपनी बौद्धिक संप्रभुता बनाए रखने के रणनीतिक औजार हैं। जब ओस्लो में एक साझा कूटनीतिक मंच पर प्रधानमंत्रित्व की संवाद शैली को लेकर एक सार्वभौमिक पैमाना थोपने का प्रयास किया जाता है, तो वह उत्तर-औपनिवेशिक समाजों की अपनी विशिष्ट और स्थानीय राजनैतिक गतिशीलता को सीधे तौर पर अदृश्य कर देता है। यह शोध इस बात की आनुभविक शिनाख्त करता है कि कैसे पश्चिमी मीडिया और थिंक-टैंक मिलकर एक ऐसे ‘विमर्श के शासन’ (Regime of Truth) को संस्थागत रूप देते हैं, जहाँ पूर्व (The Orient) को हमेशा एक ‘सीखने वाले’ या ‘कठघरे में खड़े’ छात्र के रूप में देखा जाता है, और पश्चिम खुद को एक सर्वकालिक शिक्षक और वैश्विक लोकतंत्र के अंतिम ‘जज और जूरी’ के रूप में स्थापित कर लेता है।
एडवर्ड सईद का प्राच्यवाद का सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि पश्चिम ने हमेशा पूर्व या गैर-पश्चिमी समाजों (The Orient) को ‘पिछड़ा’, ‘रहस्यमयी’ और ‘लोकतांत्रिक रूप से अपरिपक्व’ दिखाने के लिए ज्ञान और विमर्श की विशिष्ट प्रणालियाँ गढ़ी हैं, ताकि वह उनके मुकाबले खुद को तर्कसंगत, सभ्य और लोकतांत्रिक रूप से श्रेष्ठ सिद्ध कर सके। हाल ही में नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में आयोजित एक संयुक्त द्विपक्षीय प्रेस वार्ता के दौरान जब नॉर्वे की एक वरिष्ठ पत्रकार हेले लिंग ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी संवाद शैली और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर यह तीखा सवाल पूछा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता होने के बावजूद वे लाइव और खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस से क्यों बचते हैं, तो उनका यह दृष्टिकोण इसी प्राच्यवादी विमर्श (Orientalist Discourse) की पुष्टि करता प्रतीत हुआ। उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धांत (Post-colonial Theory) और सईद के इस वैचारिक चश्मे से देखें तो यह कूटनीतिक अनुष्ठान दरअसल पश्चिमी आधुनिकता और गैर-पश्चिमी समाजों के बीच के उस पुराने ऐतिहासिक तनाव को पुनर्जीवित करता है, जहाँ पश्चिम आज भी खुद को लोकतंत्र का एकमात्र वैश्विक व्याख्याकार मानता है; और यह सवाल जन-संवाद के अनूठे, स्थानीय और गैर-यूरोपीय स्वरूपों को पूरी तरह से खारिज करते हुए एक खास तरह की पश्चिमी राजनीतिक समझ को थोपने की कोशिश करता है।
इस कूटनीतिक घटनाक्रम के तुरंत बाद जब नॉर्वे के ही एक मुख्यधारा के अखबार आफ़्टनपोस्टन (Aftenposten) ने पीएम मोदी को ‘सपेरे’ (Snake Charmer) के रूप में चित्रित किया—जहाँ वे तेल की पाइपलाइन को बीन बनाकर वैश्विक राजनीति को नचा रहे हैं—तो पश्चिमी विमर्श के भीतर छुपा यह प्राच्यवाद और उसका नस्लीय औपनिवेशिक ढांचा पूरी तरह सतह पर आ गया। सईद के मूल तर्कों के आलोक में, 21वीं सदी के एक तकनीकी और आर्थिक रूप से उभरते हुए भारत को आज भी 19वीं सदी के ‘सपेरों के देश’ वाले नस्लीय रूपकों (Colonial Stereotypes) में कैद करना यह दर्शाता है कि पश्चिमी बौद्धिक व मीडिया जगत का एक बड़ा हिस्सा आज भी औपनिवेशिक ग्रंधि (Colonial Mindset) से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। वे एक संप्रभु राष्ट्र की रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक आर्थिक निर्णयों को एक आधुनिक राज्य की तार्किक परिपक्वता के रूप में देखने के बजाय, उसे ‘तीसरी दुनिया की चालाकी’ या एक आदिम मदारी के खेल के रूप में चित्रित करने की भारी नस्लीय और बौद्धिक भूल कर बैठते हैं।
इस पूरे प्रकरण को अधिक अकादमिक गहराई से समझने के लिए हमें एंटोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) के ‘सांस्कृतिक हेजेमनी’ (Cultural Hegemony/प्राधान्य) के सिद्धांत का सहारा लेना होगा, जो यह स्पष्ट करता है कि वैश्विक व्यवस्था में प्रभुत्वशाली ताकतें केवल सैन्य या प्रशासनिक बल से शासन नहीं करतीं, बल्कि वे ‘सहमति’ (Consent) के सांस्कृतिक संस्थान और मानदंड बनाती हैं। नॉर्वे जैसे नॉर्डिक देश, जो वैश्विक ‘प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ में खुद को हमेशा शीर्ष पर रखते हैं, वास्तव में इस हेजेमनी के वैश्विक ‘जज और जूरी’ बन बैठे हैं। हेले लिंग का सवाल इसी हेजेमनी से वैचारिक ऊर्जा प्राप्त करता है, जहाँ यह पहले से ही मान लिया जाता है कि लोकतंत्र और जवाबदेही को मापने का पैमाना केवल वही ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस प्रारूप’ हो सकता है जो व्हाइट हाउस या ब्रसेल्स में तय किया गया है। ग्राम्शी के तर्क के अनुसार, यह ‘सामान्य ज्ञान’ का एक ऐसा चतुर निर्माण है जिसके जरिए पश्चिमी मानदंड पूरी दुनिया के लिए एक सार्वभौमिक नियम बन जाते हैं, और जो भी समाज इस औपनिवेशिक खांचे में फिट नहीं बैठता, उसे ‘अपूर्ण लोकतंत्र’ घोषित कर उसकी प्रतीकात्मक पूँजी को चोट पहुँचाई जाती है।
इस हेजेमनी को वैश्विक धरातल पर लागू करने के लिए मिशेल फूको के ‘ज्ञान और शक्ति’ तथा ‘विमर्श’ के सिद्धांतों को समझना बेहद जरूरी है, जो यह बताते हैं कि कैसे शक्तिशाली समूह ‘सत्य’ (Truth) को उत्पादित और नियंत्रित करते हैं। पश्चिमी मीडिया नेटवर्क, अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां और थिंक-टैंक वास्तव में भू-राजनीतिक आधिपत्य के वैचारिक और संस्थागत हथियार हैं, जो एक विशिष्ट विमर्श का निर्माण करते हैं। जब भारत अपनी विदेश नीति में स्वायत्तता दिखाते हुए पश्चिमी प्रतिबंधों को दरकिनार कर रूस से कच्चा तेल खरीदता है, तो पश्चिम सैन्य हस्तक्षेप नहीं कर सकता; लिहाजा, वह फूको के ‘सत्य के शासन’ (Regime of Truth) का उपयोग करता है। ‘मानवाधिकार’, ‘प्रेस स्वतंत्रता’ और ‘अल्पसंख्यक अधिकारों’ के विमर्श को इस तरह से बुना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उछाला जाता है ताकि वैश्विक स्तर पर भारत की नैतिक स्थिति को कमजोर किया जा सके, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ये सवाल शुद्ध पत्रकारिता से नहीं, बल्कि नैरेटिव को नियंत्रित करने की वैश्विक शक्ति-संरचना से प्रेरित हैं।
इसके विपरीत, उत्तर-औपनिवेशिक कूटनीति के भीतर से अब एक मजबूत ‘प्रति-आधिपत्य’ (Counter-Hegemony) का उदय हो रहा है, जो पश्चिम के इन प्रभुत्वशाली विमर्शों को सीधे चुनौती दे रहा है। जब भारत की राजनीतिक और कूटनीतिक व्यवस्था इन पश्चिमी सूचकांकों और पैमानों को ‘त्रुटिपूर्ण, व्यक्तिपरक और औपनिवेशिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त’ कहकर खारिज करती है, तो वह वास्तव में उस ‘ज्ञान-मीमांसा की गुलामी’ को तोड़ने का प्रयास कर रही होती है जो सदियों से अजेय मानी जाती रही है। हालांकि, इस विमर्श का अंतर्विरोध यह भी है कि जहाँ एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर पश्चिमी मीडिया के दोहरे मापदंडों और नस्लीय रूढ़ियों का कड़ा विरोध होना ही चाहिए, वहीं दूसरी तरफ इस राष्ट्रीय संप्रभुता के तर्क की आड़ में घरेलू स्तर पर प्रेस की वास्तविक स्वतंत्रता, कॉरपोरेट एकाधिकार और असहमति के दमन जैसे बुनियादी लोकतांत्रिक सवालों को भी गायब नहीं होने दिया जा सकता।
निष्कर्ष:
ओस्लो की घटना यह साबित करती है कि वैश्विक विमर्श अब एक चौराहे पर है, जहाँ उत्तर-औपनिवेशिक समाजों को अपनी लोकतांत्रिक नियति और आंतरिक आलोचना के मानदंड तय करने के लिए अब पश्चिम की ‘राजनैतिक डिक्शनरी’ या औपनिवेशिक चश्मे की आवश्यकता नहीं है। इस कूटनीतिक और वैचारिक गतिरोध को दूर करने के लिए यह आवश्यक सुझाव है कि वैश्विक विमर्श के ढांचों का वि-औपनिवेशीकरण किया जाए, जिसमें पश्चिमी संस्थाएं गैर-पश्चिमी समाजों के राजनीतिक मॉडलों को अपने मानकों पर तौलना बंद करें। साथ ही, उत्तर-औपनिवेशिक राष्ट्रों को भी अपनी संप्रभुता के दावों को मजबूत करने के लिए आंतरिक लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक पारदर्शी, बहुलतावादी और स्वतंत्र बनाना होगा, ताकि वैश्विक स्तर पर किसी भी प्राच्यवादी आलोचना को केवल कूटनीतिक तर्कों से ही नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ और आदर्श संस्थागत यथार्थ से भी ध्वस्त किया जा सके।
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