गांधी ने पत्रकारिता को जनसेवा और सत्य का हथियार बनाया

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Mahatma Gandhi

हिंदी पत्रकारिता दिवस हमें केवल पत्रकारिता की परंपरा का स्मरण नहीं, बल्कि उसके मूल उद्देश्य पर भी विचार करने का अवसर देता है। पत्रकारिता का धर्म सत्ता का गुणगान या विरोध नहीं, बल्कि सत्य का निर्भीक प्रस्तुतीकरण है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसी आदर्श को अपनी पत्रकारिता का आधार बनाया। उनके लिए समाचार पत्र जनमत निर्माण, सामाजिक जागरण और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का सशक्त माध्यम थे। गांधी का पत्रकार जीवन आज भी पत्रकारिता की नैतिकता, उत्तरदायित्व और सत्यनिष्ठा का सर्वोत्तम नैतिक पैमाना प्रस्तुत करता है।

महात्मा गांधी की पत्रकारिता कोई अचानक विकसित हुई धारा नहीं थी; वह भारतेंदु युग के ‘ब्राह्मण’ समाचार पत्र के प्रसिद्ध पत्रकार पंडित प्रताप नारायण मिश्र, हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह बाबूराव विष्णु पराड़कर और प्रताप समाचार पत्र के अद्वितीय संपादक और साम्प्रदायिक सौहार्द के अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी जैसी महान पत्रकार परंपरा का स्वाभाविक विस्तार थी। मिश्र ने पत्रकारिता को लोकमिलाप का माध्यम माना, पराड़कर ने उसे समाज का दर्पण बताया और विद्यार्थी ने सत्य तथा जनपक्षधरता को उसका प्राण कहा। गांधी जी ने इन सभी आदर्शों को अपने जीवन, संघर्ष और अखबारों के माध्यम से व्यवहार में उतारकर पत्रकारिता को जनसेवा और सत्याग्रह का सशक्त उपकरण बना दिया।

महात्मा गांधी ने इन आदर्शों को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारा। वे मूलतः पत्रकार बनने नहीं निकले थे। एक युवा वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका पहुँचे गांधी जी को वहाँ भारतीय मजदूरों और प्रवासियों पर हो रहे अन्याय ने झकझोर दिया। उन्होंने देखा कि समाज बिखरा हुआ है, लोगों की आवाज़ कहीं सुनाई नहीं देती। तब उन्होंने समझा कि संघर्ष को दिशा देने के लिए एक ऐसे माध्यम की आवश्यकता है जो लोगों को जोड़े और उनकी बात दुनिया तक पहुँचाए।

इसी आवश्यकता से 1903 में इंडियन ओपिनियन का जन्म हुआ। यह केवल एक अखबार नहीं था, बल्कि अधिकारों की लड़ाई का साधन था। गांधी ने इसे अंग्रेजी, गुजराती और तमिल भाषाओं में प्रकाशित कराया ताकि शासक भी पढ़ सकें और पीड़ित समाज भी अपनी आवाज़ पहचान सके। अखबार का नाम ‘ इंडियन ओपिनियन ‘ ही एक घोषणा थी—भारतीयों की भी अपनी राय है, अपना दृष्टिकोण है और उसे सुना जाना चाहिए।

गांधी के लिए पत्रकारिता कभी व्यवसाय नहीं रही। वह जनसेवा, आत्मानुशासन और सत्य की साधना थी। उन्होंने लिखा कि अखबार उनके लिए संयम की पाठशाला है। वे किसी भी शब्द को बिना सोचे-समझे लिखने के पक्ष में नहीं थे। न अतिशयोक्ति, न किसी को प्रसन्न करने की चेष्टा और न ही जानबूझकर किसी तथ्य को तोड़ना-मरोड़ना—यही उनकी पत्रकारिता की पहचान थी।

गांधी मानते थे कि समाचार पत्र एक अत्यंत शक्तिशाली साधन है। जिस प्रकार अनियंत्रित जलप्रवाह गाँवों को डुबो सकता है, उसी प्रकार अनियंत्रित कलम समाज को बहुत व्यापक नुकसान पहुँचा सकती है। लेकिन वे यह भी मानते थे कि पत्रकारिता पर बाहरी नियंत्रण उससे भी अधिक खतरनाक है। इसलिए पत्रकार का सबसे बड़ा अंकुश उसका अपना विवेक और आत्मानुशासन होना चाहिए।

भारत लौटने के बाद भी गांधी जी ने पत्रकारिता को अपने सार्वजनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाए रखा। यंग इंडिया, नवजीवन और बाद में हरिजन जैसे पत्रों के माध्यम से उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार, अस्पृश्यता उन्मूलन, ग्राम स्वराज और राष्ट्रीय एकता के विचारों को जन-जन तक पहुँचाया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पत्रकारिता के बिना आजादी की लड़ाई लड़ी ही नहीं जा सकती। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता को स्वतंत्रता संग्राम का अनिवार्य हिस्सा माना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर होने वाले हर प्रहार का विरोध किया।

गांधी केवल विचारक पत्रकार नहीं थे, बल्कि उत्कृष्ट संपादक और लेखक भी थे। वे नियमित रूप से लिखते थे, पाठकों के पत्र पढ़ते थे, उनका उत्तर देते थे और संवाद को लोकतंत्र का आधार मानते थे। उनके लिए पत्रकारिता का अर्थ था—जनता को जागरूक करना, सत्ता से तीखे प्रश्न पूछना और समाज को आपस में जोड़ना।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधी ने पत्रकारिता को अहिंसा के संघर्ष का माध्यम बनाया। उन्होंने सिद्ध किया कि शब्द भी परिवर्तन ला सकते हैं, विचार भी क्रांति कर सकते हैं और कलम भी अन्याय के विरुद्ध उतनी ही प्रभावी हो सकती है जितना कोई आंदोलन।

आज हिंदी पत्रकारिता दिवस सच्चे और निर्भीक पत्रकारों के लिए गांधीवादी साहस और गोदी मीडिया और टीवीपुरम के पत्रकारों के लिए गांधीवादी चेतावनी है कि तुम कुछ भी कर लो लेकिन पत्रकारिता जैसे पवित्र काम को मत करो। पत्रकार का पहला दायित्व किसी सरकार, दल या विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि सत्य के प्रति होता है। पत्रकार अपने समय का कैमरा है, जिसे वही दिखाना चाहिए जो उसके सामने है, बिना भय, बिना पक्षपात और बिना लालच के। जब कलम सत्य, संवेदना और जनहित से जुड़ जाती है, तब वह केवल समाचार नहीं लिखती, इतिहास रचती है।


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