जेएनयू में प्रवेश लेने के बाद लिंग्विस्टिक एम्पावरमेंट सेल द्वारा आयोजित की जाने वाली अकादमिक लेखन संबंधी कक्षाओं में भाग लेने के लिए मैं एल.इ.सी. लैब जाया करता था। वे कक्षाएँ तब जे.एन.यू. के ईस्ट गेट के पास संचालित होती थीं। उन कक्षाओं में जे॰एन॰यू॰ के ही कुछ सीनियर छात्र और कुछ अन्य शिक्षक-शिक्षिकाएँ हमें अकादमिक लेखन के बारे में पढ़ाया करते थे। उन शिक्षकों में माद्री काकोटी भी थीं, जो अब लखनऊ विश्वविद्यालय में भाषाविज्ञान की शिक्षिका हैं और यूट्यूब पर “मिस मेडुसा” के नाम से चर्चित हैं।
एल.इ.सी. की उन्हीं कक्षाओं में एक शिक्षिका ने यूट्यूब पर उपलब्ध टेड टॉक्स के चैनल पर व्याख्यान सुनने को कहा था। विशेष रूप से उन्होंने अनुपम मिश्र के व्याख्यान को सुनने के लिए सुझाया, जो पर्यावरण और भारतीय समाज में जल-संरक्षण की परम्परा के बारे में था।
तब तक मैं अनुपम मिश्र के नाम और काम से अनभिज्ञ था। एल.इ.सी. की उन शिक्षिका के सुझाव के लिए मैं उनका हमेशा कृतज्ञ रहूँगा, जिनकी वजह से मैंने अनुपम मिश्र के उस अठारह-उन्नीस मिनट के व्याख्यान को सुना, जिसमें वे भारत में जल संरक्षण और तालाबों की परम्परा के बारे में बताते हैं।
यह व्याख्यान अनुपम मिश्र के काम से मेरा पहला परिचय था। यूट्यूब पर उपलब्ध उनके उस व्याख्यान को सुनने के बाद मैंने उनकी किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ जेएनयू लाइब्रेरी में ढूँढ़कर पढ़ी। बाद में उस किताब की कई प्रतियाँ अपने दोस्तों को भी पढ़ने के लिए दीं।
फिर अनुपम जी के लेख, व्याख्यान और अन्य पुस्तकें भी धीरे-धीरे खोज-खोजकर पढ़ना शुरू किया। भारतीय समाज में पानी को लेकर जो परंपरागत समझ सदियों से गुजरकर बनी है, उसे जानने-समझने में उनकी इन रचनाओं ने मेरी विशेष मदद की। अनुपम जी के लेखन के ज़रिए बाढ़, अकाल, सूखा और पर्यावरण से जुड़े तमाम सवालों को समझने की एक दृष्टि मिली।
‘साफ माथे का समाज’ जैसी उनकी किताबें हों या फिर राजस्थान की जल संरक्षण की परंपरा पर उनकी अनोखी किताब ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ पढ़ना हो, वह लोकविद्या की एक अलग ही दुनिया से वाकिफ होना था। उनकी मृत्यु के बाद छपे उनके लेखों का संकलन ‘विचार का कपड़ा’ या ‘बिन पानी सब सून’ जैसी किताबें भी उनके व्यापक सरोकारों की बानगी देती हैं।
आज अनुपम जी का जन्मदिन है, उन्हें सादर नमन!
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