— महापंडित राहुल सांकृत्यायन —
होश सँभालते ही जिसे योग, वैराग्य और वेदांत ने अपनी ओर खींचा, जिसे मायामय संसार छोड़ अद्वैत ब्रह्म में लीन होने की एक समय भारी साध थी; किसको पता था कि वह संसार के सबसे उपेक्षित, शिक्षा-संस्कृति में सबसे पिछड़े भारतीय किसानों को अपने पैरों पर खड़ा करने की प्रतिज्ञा लेगा? वह एक मेधावी बालक के तौर पर शिक्षा के जिस रास्ते से जा रहा था, उससे वह विश्वविद्यालय का एक सम्मानित स्नातक बनता, कानूनपेशा वकील, सरकारी नौकर या प्रोफेसर बनता; मगर रास्ता एकाएक मुड़ा, और वह दूसरे – भारतीय प्राचीन विद्या के – रास्ते पर चला गया। वह विद्वान संन्यासी के तौर पर अपनी प्रौढ़ प्रतिभा और व्यापक ज्ञान से एक सर्वमान्य संन्यासी, सैकड़ों छात्रों और शिष्यों का गुरु होता; मगर ब्राह्मणों के मिथ्याभिमान ने व्यक्ति नहीं, एक गौरवपूर्ण जाति को अपमानित करना चाहा और वह उसे बर्दाश्त नहीं कर सका। उसने अपने दंड को उठाया और कुछ ही सालों में भूमिहार ब्राह्मणों में वह भाव भर दिया कि ब्राह्मणों को अपनी शेखी छोड़नी पड़ी। लेकिन समय आया, जब उसकी तीक्ष्ण प्रतिभा ने बतलाया कि उसका कार्यक्षेत्र इतना संकुचित नहीं होना चाहिए, फिर जेल गया। वहाँ पक्के गांधी-शिष्यों की करतूतों को देख कर उसकी देह में आग लग गई। राजनीतिक आंदोलन में उसे कोई भी आशा नहीं रह गई। जिसने योग-साधन, पवित्र जीवन और मोक्ष-प्राप्ति के लिए दर-दर की ठोकर खाई, वर्षों तकलीफें सहीं, उसके मन में इस तरह का भाव आना जरूरी था। वह सबको संत के रूप में देखने की आशा तो नहीं रखता था, मगर यह आशा जरूर रखता था कि गांधी जी के विश्वसनीय भक्त कुछ ज्यादा ईमानदार होंगे। उसने अपने जानते राजनीति से सदा के लिए सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया। वह नहीं जानता था कि उसके दिल में एक भारी कमजोरी है – वह गरीबों के ऊपर होते अत्याचार को सहन करने की शक्ति नहीं रखता। हुआ यही और अब वह नाव को डुबो कर परले पार उतर गया। भारत के किसान-आंदोलन को उठाने और आगे बढ़ाने में जो काम उसने किया है, वह सदा स्मरणीय रहेगा। वह व्यक्ति है स्वामी सहजानन्द।
गाजीपुर जिले में दुल्लहपुर स्टेशन के पास देवा एक छोटा-सा गाँव है, यहाँ कुछ घर भूमिहार ब्राह्मणों के हैं। आज ये लोग भूमिहार ब्राह्मण हैं, लेकिन कुछ पीढ़ियों पहले ये बुंदेलखण्ड के जुझौतिया ब्राह्मण थे। दस-बारह शताब्दियों और पहले ये यमुना से पश्चिम हिमालय की तराई से मेवाड़ तक फैले यौधेय गण के नागरिक थे।
1889 ई. की शिवरात्रि को बेनीराय के घर उनका सबसे छोटा पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम नौरंग राय रखा गया। 3 बरस की आयु में ही माँ मर गई और नौरंग को माँ का नाम भी नहीं मालूम हो सका। माँ के मरने की क्षीण स्मृति नौरंग के दिल में सदा के लिए रह गई। लोग रो रहे थे। नौरंग की आँखों से आँसू निकले या नहीं, इसका उसे पता नहीं। लड़कपन से ही नौरंग का स्वास्थ्य अच्छा था; लेकिन उसे खेल से बिलकुल प्रेम न था।
गाँव में स्कूल न था, मगर पास के गाँव जलालाबाद में प्राइमरी स्कूल था। 1899 के शुरू में नौरंग को जलालाबाद के मदरसे में दाखिल कर दिया गया। यद्यपि पढ़ने की अवस्था के 4 साल उसने बरबाद कर दिए थे; लेकिन उसकी बुद्धि बहुत तीव्र थी, गणित से बहुत ही ज्यादा प्रेम था। मरदसे में हर साल वह दो-दो दर्जे पास करता और अपने दर्जे में सदा प्रथम रहता। 1902 तक 3 सालों के भीतर नौरंग ने 6 साल की पढ़ाई खत्म कर दी। अपर प्राइमरी पास लड़कों की जिला-प्रतियोगिता में उसने बीस में से उन्नीस अंक पाए।
अब नौरंग 13 साल का था। रामायण पढ़ने का उसे बहुत शौक था। किसी ने गीता का माहात्म्य बतलाया और उसे भी अपने पाठ में शामिल कर वह अच्छा-खासा पुजारी बन गया। जलालाबाद के एक अध्यापक भी पुजारी थे, नौरंग की पूजा में उनका प्रभाव अवश्य था। पूजा बिना देवता को खुश कैसे किया जा सकता है।
अब मिडिल में पढ़ने के लिए नौरंग गाजीपुर तहसीली स्कूल में दाखिल हुआ। दर्जे में अव्वल तो रहना ही था। सभी विषयों में उसकी गति थी। स्मृति भी तीक्ष्ण थी, 1904 में हिंदी मिडिल पास किया, सारे युक्त प्रांत में नौरंग का नंबर छठा या सातवाँ था। उर्दू को नियमपूर्वक नहीं पढ़ा था; लेकिन उर्दू पढ़नेवाले विद्यार्थियों के साथ बराबर बैठना पड़ता, जिससे सुनते-ही-सुनते नौरंग को उर्दू आने लगी।
गाजीपुर में आ कर नौरंग की आक्रामक प्रवृत्ति और बढ़ गई। यहाँ उसे सनातन धर्म और आर्यसमाज के उपदेशकों के व्याख्यान सुनने को मिलते। धर्म पर श्रद्धा और जमती गई। वह आर्यसमाजी नहीं बना और रोज नियम से स्नान कर शंकर के ऊपर बेलपत्र और गंगाजल चढ़ाता। शिव जी का व्रत बड़े उत्साह के साथ करता। उस वक्त अमृतराय वहीं अध्यापक थे। वे खुद भी प्रतिभाशाली थे; इसलिए प्रतिभाशाली लड़के की कदर करना जानते थे। नौरंग राय भी उन्हीं के साथ में रहता।
हिंदी मिडिल पास करने के बाद फिर नौरंग को छात्रवृत्ति मिली और वह गाजीपुर के जर्मन मिशन हाई स्कूल (आजकल के राजकीय सिटी इंटर कॉलेज, गाजीपुर) में प्रविष्ट हुआ। मारवाड़ियों के टोले में गुणेश्वरनाथ महादेव का मन्दिर है। उसी की एक कोठरी में नौरंग रहा करता था। वहाँ गंगा भी नजदीक थीं और पास में महादेव का मन्दिर भी। नौरंग राय को इन दोनों चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत थी। अब नौरंग राय के पाठ्य में संस्कृत भाषा भी थी। अपने रटे महिम्न:स्तोत्र और गीता के श्लोकों का अर्थ समझने की लालसा में वह उसे बहुत ध्यान से पढ़ता था।
नौरंग का पूजा-पाठ घरवालों को पसंद न था। देर करने में हानि समझ 16 वर्ष की अवस्था (1905) में नौरंग की शादी कर दी गई। लेकिन स्त्री एक ही साल बाद परलोक सिधार गई।
मिडिल इंग्लिश में भी नौरंग राय का नंबर अच्छा रहा। 1906 में कुछ संन्यासी घूमते-घामते उसी महादेव के मन्दिर में ठहरे। नौरंग धर्म-प्रेमी तो था ही संन्यासियों का गेरुआ वस्त्र तथा उनके उन्मुक्त जीवन उसे और भी आकर्षक मालूम हुए। एक साल पहले भी नौरंग भागकर बनारस और काकोरी तक गया था; लेकिन बरसात का दिन था और अभी दिल मजबूत नहीं हुआ था, इसलिए वहाँ से लौट आया। इस पहली उड़ान का घरवालों में से किसी को पता नहीं था और यह अच्छा ही हुआ, नहीं तो वे और कड़ी निगाह रखते। अबकी नौरंग ने बनारस के संन्यासियों से उनके मठ का पता पूछ लिया था। वह अपने लिए यही रास्ता पसंद कर चुका था।
अब (1907 में) नौरंग की उम्र 18 साल की थी। वह हाई स्कूल की आखिरी कक्षा का विद्यार्थी और बहुत तेज विद्यार्थी था। मैट्रिक परीक्षा में भी उसे छात्रवृत्ति जरूर मिलती और घर की मदद के बिना भी विश्वविद्यालय की सभी सीढ़ियों को पार कर सकता था। वह जानता था कि वह एक अच्छा वकील बन सकता है, अध्यापक बन सकता है या डिप्टी कलेक्टर हो सकता है। लेकिन नौरंग का मन रह-रह कर कह उठता, ‘और पढ़-लिख कर क्या करोगे? तुम्हें कोई दूसरा खिला देगा।’ अब वह गीता को कुछ समझ सकता था। उसने लघुकौमुदी पढ़ी। भागवत को भी वह शौक से संस्कृत में पढ़ता। यही नहीं, छोटी-मोटी वेदांत की पुस्तकें भी पढ़ लेता, इससे उसका दिल वेदांत से रँग गया।
शायद घरवालों को कुछ भनक लगती जा रही थी। उन्होंने सोचा – जल्दी ही शादी कर दो, नहीं तो लड़का हाथ से बेहाथ होने जा रहा है। नौरंग को भी पता लग गया; खतरे की घंटी बजी – ‘भागो अभी।’
शिवरात्रि (1907) के कुछ ही दिनों पहले नौरंग राय भाग कर बनारस चले आए। सिद्ध अपारनाथ मठ का नाम नोट किया हुआ था। गाजीपुर में पहले के परिचित संन्यासी भी मिल गए। शिवरात्रि जैसे महान पर्व को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। सलाह हुई, शिवरात्रि के दिन ही संन्यास ले लिया जावे। स्वामी अच्युतानन्द गिरि व्याकरण-मीमांसा के एक अच्छे पंडित थे। 18 साल के नौरंग उन्हीं से गिरिनामा संन्यासी बने। जब उनके बालमित्र हरिनारायण पांडेय को पता लगा, तो वे भी आकर संन्यासी हो गए।
चंद ही दिनों बाद-घरवालों को पता लग गया और लोग बनारस पहुँचे। स्वामी सहजानन्द को घर आना पड़ा। सब लोग समझाने लगे। खाकीजी बुला कर लाए गए। तरुण संन्यासी के मुँह से ज्ञान-वैराग्य की बात सुन कर कहने लगे – ‘हमारी समझ से बाहर की बात है, हम क्या समझाएँ?’ खाकीजी की इस देहात में बड़ी प्रसिद्धि थी। वह सिद्ध पहुँचे हुए महापुरुष समझे जाते थे। अन्त में हार मानकर घरवालों को स्वामी का रास्ता छोड़ना पड़ा। स्वामी फिर दुल्लहपुर स्टेशन से रेल पकड़ बनारस चले आए।
स्वामी और बालसखा हरिनारायण को संन्यास-जीवन और उससे भी ज्यादा योग-समाधि का शौक था। बनारस में कोई योगी नहीं मिला। उन्होंने अब योगी गुरु को ढूँढ़ निकालने का निश्चय किया। दोनों गंगा के किनारे-किनारे पैदल ही पश्चिम की ओर चल पड़े। भोजन के लिए दस घरों से मधुकरी माँग लेते। झूँसी (प्रयाग) तक किसी योगी से भेंट नहीं हुई। झूँसी में मठ की छत पर नंगे सोने से शरीर में दर्द और बुखार हो आया। किसी ने दवा समझ कर चाय पिलाई, मगर बीमार बेहोश हो गया। एक और साधु वैद्यक करने लगे और लोहा पीस कर पिला दिया। किसी समझदार आदमी ने कहा भी – ‘जहर पिला रहा है, मर जावेगा’; मगर कई खुराक खा चुकने के बाद सारे शरीर में रोएँ-रोएँ पर फुंसियाँ निकल आयीं। आज इस घटना को हुए सालों बीत गए, और स्वामी खाने-पीने में बड़ा संयम रखते हैं; मगर आज भी लोहे का प्रभाव बिलकुल खत्म नहीं हुआ। महीने-भर झूँसी में बीमार पड़े रहे, बड़ी पीड़ा सहनी पड़ी।
शरीर के सँभलते ही फिर योगी की खोज। किसी ने बतलाया – चित्रकूट में योगी रहते हैं। दोनों ने चित्रकूट का रास्ता पकड़ा पैदल ही। मगर वहाँ भी दूर का ढोल सुहावना। जंगल की ओर बढ़े। अनुसूया के बैरागी बाबा को पीटकर चोर सोलह हजार रुपए ले कर चंपत हो गए थे। कादमगिरि में बैरागियों (वैष्णवों) के स्थान हैं, और शायद ही कोई योगिनी बिना हो। वहाँ रात को रहने के लिए कोई स्थान देने को तैयार न हुआ। चित्रकूट से निराश लौटे। तुलसीदास की जन्मभूमि ‘राजापुर’ देखी; फिर प्रयाग की सड़क पकड़ी और पश्चिम की ओर मुँह किया। अब अँतरिया बुखार आने लगा था। भादों का दिन था, वर्षा हो रही थी। बुखार के दिन पूड़ी मिली, खा लिया, ऊपर से ठंडी हवा लगी। बुखार और बढ़ा। गाँव में शरण ढूँढ़ने गए, किसी ने बीमार परदेशी संन्यासी को जगह न दी। गाँव में एक टूटी चौपाल थी, जिसमें गोबर का कीचड़ भरा हुआ था, दुर्गंध का ठिकाना नहीं था, वहाँ बैठने के लिए भी स्थान नहीं था। पानी-बूँदी में जाएँ कहाँ? चौपाल में खड़े रहे, जब वर्षा बंद हुई, तो फिर उस गाँव को अभागे संन्यासी तरुणों ने सलाम किया। फतेहपुर के पहले महादेव का मन्दिर मिला था, जिसमें दोनों ठहरे। बुखार जाता रहा। पूड़ी ने बुखार को बढ़ाया, महादेव जी ने छुड़ा दिया। घूमने के अलावा इस वक्त गीता और शिव-महिम्न:स्तोत्र का पाठ होता रहता। साथ में कुछ वेदांत की पुस्तकें थीं, कुछ उन्हें भी किसी-किसी समय देख लेते।
पता लगा, नर्मदा के तट पर योगी रहते हैं। कानपुर से कालपी की ओर मुड़े। उरई, झाँसी, ललितपुर सब पैदल गए। यहाँ 52 घंटे तक अन्न से भेंट नहीं हुई। श्रद्धा सारे भारत में एक-सी तो बँटी नहीं है। भूख ने दूर चले जाने को मजबूर किया। बेटिकट रेल पकड़ी और बीना में उतर पड़े। फिर पैदल। सागर में नर्मदा पार की। नरसिंहपुर होते हुए मानेपुर (जबलपुर जिला) में पहुँचे। यहाँ हरिनारायण जी के परिचित एक राजपूत गृहस्थ रहते थे। वह संन्यासियों के भक्त और वेदांत के शौकीन थे। वेदांत पढ़ते-पढ़ाते तथा कुछ दवा भी करते थे। 15-20 दिन यहीं दोनों जने ठहरे।
पहले भी सुन चुके थे और मानेपुर में भी ओंकारेश्वर के कमलभारती से योग सीखने की लालसा ले खण्डवा होते हुए ओंकार पहुँचे। योगी वहाँ से और उत्तर के जंगल में रहते थे। वहाँ पहुँचने पर मालूम हुआ, वह अनंत समाधि ले चुके हैं। किसी ने कहा – ‘योगी-वोगी नहीं थे, कायाकल्प करते थे।’ उनके चेले को भी कोई-कोई योगी कहते थे और उनका योग था – द्वार बंद कर दिन-भर सोते रहना।
फिर पैदल। पैसे पास नहीं थे, खाने के लिए भिक्षा ‘मधुकरी’ माँग लेते, और रसवती मालव-भूमि में उसकी कमी नहीं हुई। हाँ, अब योग से निराश हो चले। ‘दूर का ढोल सुहावना’ की बात ठीक जँचने लगी। हाँ, वैराग्य पर दृढ़ श्रद्धा थी। भर्तृहरि का ‘वैराग्यशतक’ बड़ा सुंदर लगता था। इंदौर होते हुए उज्जैन गए। बीस दिन महाकालेश्वर की नगरी में बीता फिर पैदल ही उत्तर का रास्ता लिया। मथुरा, हाथरस, हरिद्वार होते हुए ऋषिकेश पहुँचे।
अब सन 1908 था। योग की आशा जाती रही थी। सोचा, कुछ वेदांत ही पढ़ डालें। कैलाश-आश्रम के किसी संन्यासी के पास ‘वेदांत मुक्तावली’ पढ़ने लगे। मगर व्याकरण कच्चा था, इसलिए समझने में कठिनाई होने लगी। कुछ यह भी मन में होने लगा, ‘संस्कृत की खान बनारस छोड़, यहाँ टक्करें मारने की जरूरत?’
यहाँ तक आए तो चलो हिमालय की तीर्थयात्रा ही कर डालें। अभी हिमालय के तीर्थ इतने आबाद नहीं हुए थे। रास्ते कठिन थे। धर्मशालाओं-सदावर्तों की आज की भरमार का नाम तक न था। कभी-कभी, दो-दो दिन तक खाना नहीं मिलता और दोनों पथिक ठिठुर कर लेट जाते। केदारनाथ हो कर जब तुंगनाथ पहुँचे, तो हरिनारायण जी से अलग हो जाना पड़ा। इतने दिनों के तजुर्बे ने बतला दिया कि यहाँ ‘मन मिले का मेला’ नहीं है। अब बिलकुल एकाकी-अकेले चलना, अकेले भूखे रहना। बदरीनाथ से ऋषिकेश लौट आए, मगर वहाँ कोई आकर्षण न था।
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