
जंगे -आजादी के सिपहसालार सोशलिस्ट तहरीक के जन्मदाताओं में से एक जयप्रकाश जी की पहचान एक मजदूर नेता के रूप में भी इतिहास में दर्ज हैं।. 1930 में जयप्रकाश जी को कांग्रेस अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरू ने बुलाकर कांग्रेस की मजदूर सेल की जिम्मेदारी संभालने को कहा, मजदूर आंदोलन के साथ कांग्रेस का रिश्ता बनाए रखने के उद्देश्य से इसकी स्थापना की थी। जयप्रकाश जी ने राष्टीय और अन्तर्राष्ट्रीय- टेड्र यूनयनो से अपना सम्पर्क स्थापित किया। इस सिलसिले में उन्होने ब्रिटिश लेबर पार्टी तथा टेड्र-यूनियन कांग्रेस से भी सम्पर्क स्थापित किया। उन्होंने औद्योगिक श्रमिकों की समस्या पर अपनी रपट प्रस्तुत की।
जयप्रकाश नारायण देशहित के लिए भी मजूदर यूनियन का उपयोग करते थे। 1939 में उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आंदोलन का नेत्तृव किया। टाटा स्टील कम्पनी में हड़ताल करवाकर यह प्रयास किया कि अंगेज को स्टील आदि न पहुच सकें। जिसके लिए उन्होंने किराया और राजस्व रोकने का अभियान चलाया। इस कारण ब्रिटिश सरकार ने उनकों गिरफ्तार कर 9 महीने की सजा सुना दी।
1940 के दशक में जयप्रकाश नारायण ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ के एक प्रमुख नेता थे और उनका प्रयास था हिंदुस्तान के मजदूर संघों को सीधे स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने का। जेपी ने देशभर में डाक- तार तथा रेलवे कर्मचारियों को संगठित करने में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने हड़ताली कर्मचारियों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष तेज करने के लिए भी प्रेरित किया। उस समय जेपी ‘ऑल इंडिया रेलवे मैन फेडरेशन’ के अध्यक्ष भी थे। रेलवे और डाक-तार कर्मचारी हड़ताल लगभग एक ही समय 1946 में हुई, जिससे ब्रिटिश प्रशासन पर भारी दबाव पड़ा। 1946 की पोस्ट एंड टेलीग्राफ यूनियन की हड़ताल 11 जुलाई 1946 को शुरू हुई थी जो 23 दिनों तक चली थी कर्मचारियों की मांग थी कि महंगाई के दौर में कम वेतन तथा अन्य 16 सूची अन्य मांगों को लेकर थी। हड़ताल बहुत सफल रही और ब्रिटिश सरकार ने यूनियन की अधिकतर मांगों को मान लिया। परंतु एक मुद्दा अभी भी था की हड़ताल के दौरान जो कर्मचारी काम पर नहीं आए थे उन्हें उस अवधि का वेतन नहीं मिल रहा था। 1951 में जेपी जब यूनियन के अध्यक्ष बन गए तो उन पर हड़ताल पर जाने का दबाव बढ़ा। उन्होंने तात्कालिक संचार मंत्री रफी अहमद किदवई से कर्मचारियों की मांगो तथा हड़ताल के समय के वेतन पर विस्तार से चर्चा की। रफी अहमद किदवई ने मौखिक रूप से इस मांग को स्वीकार कर लिया। इस आश्वासन के बाद कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने के निर्णय को छोड़ दिया। परंतु बाद में मंत्री रफी अहमद किदवई ने इस प्रकार के किसी भी समझौता होने की बात को अमान्य करार दे दिया। जेपी को अफसोस था कि इस संदर्भ में लिखित में कोई भी पत्र उनके पास नहीं था। उन्होंने इसको अपनी भयंकर भूल माना।
1951 में जेपी ने इस भूल का प्रायश्चित करते हुए अपने आत्म शुद्धि के लिए 21 दिन का उपवास शुरू कर दिया, तथा घोषणा की यह किसी के विरुद्ध नहीं है। 2 दिन के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जेपी को खत लिखते हुए कहा कि तुम्हारा जीवन बहुत बहुमूल्य है, हमने तुम्हारी मांगों को मान लिया है इसलिए कृपया अपना उपवास समाप्त करें। उसके उत्तर में जेपी ने लिखा कि यह उपवास किसी के विरुद्ध नहीं बल्कि अपनी ही आत्म शुद्धि के लिए किया गया है। मुल्क भर में लोग जेपी के सेहत को लेकर चिंतित थे। चारों तरफ से जेपी पर उपवास समाप्त करने के लिए अनुरोध किया गया, इस सबके बावजूद 21 दिन बाद ही 13 जुलाई को उन्होंने अपने उपवास को खत्म किया। जेपी ने तमाम मजदूर संघो को सलाह दी कि भविष्य में यूनियन कोई भी समझौता मौखिक रूप से न कर लिखित रूप में करें।
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