— राजेश रामकृष्णन —
केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की पूंजीवादियों की मित्र सरकार ने कॉर्पोरेट्स के पक्ष में और देश के प्रकृति पर निर्भर प्राथमिक उत्पादकों (किसानों, मछुआरों, वन-निवासियों और पशुपालकों) तथा उन्हें सहारा देने वाले जल-जंगल-ज़मीन के खिलाफ एक और क़दम उठाया है। हाल ही में संसद ने खान एवं खनिज (विकास और नियमन) संशोधन अधिनियम 2026 (MMDR) पारित किया है। दावा तो यह किया जाता है कि माइनिंग के क्षेत्र में पूरे देश में एक समान टैक्स लागू करने के लिए यह अधिनियम बनाया गया, लेकिन सच यह है कि इससे कॉर्पोरेट्स को कम समय में देश की खनिज संपदा को ज़्यादा से ज़्य़ादा खत्म करने में मदद मिलेगी। नतीजा यह होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ नहीं बचेगा। इतना ही नहीं, इससे पर्यावरण के विनाश में तेज़ी आएगी और आम लोगों की परेशानियाँ बढ़ जाएंगी। इसकी भरपाई के लिए राज्य सरकारों के पास धन नहीं होगा। इस संशोधन को रद्द करने के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए, क्योंकि यह केवल पूंजीवादी दोहन को बढ़ावा देता है।
संशोधन:
हालांकि MMDR एक्ट द्वारा पहले से ही केंद्र सरकार को खदानों के नियमन और खनिजों के विकास को नियंत्रित करने का अधिकार मिला है, लेकिन 2026 का संशोधन द्वारा केन्द्र ने खनिज-युक्त ज़मीनों को नियंत्रित करने का अधिकार भी हथिया लिया है। यह संशोधन द्वारा राज्यों का कुछ शुल्क लेने का अधिकार छीन लिया गया है। यह नियम किसी भी टैक्स, सेस या ऐसी ही दूसरी लेवी पर लागू होता है, जो खनिज की मात्रा, खनिज के मूल्य, रॉयल्टी या किसी अन्य आधार पर हों। यह संशोधन के लागू होने से पहले अगर किसी कंपनी पर राज्य सरकार की लेवी को चुकाना बाक़ी है, तो वह बकाया राशि को या वसूल न की गई रकम को अमान्य माना जाएगा। मतलब, राज्य सरकर उस लेवी को वसूल नहीं कर सकेगी। अगर राज्य सरकार ने कोई लेवी को वसूल कर ली है, तो वह कंपनी को वापस करना ज़रूरी नहीं है। साफ तौर पर, इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य माइनिंग कंपनियों द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले टैक्स के बकाया को खत्म करना और माइनिंग में निवेश करने वाली, विदेशी और घरेलू कंपनियों के लिए एक निश्चित वित्तीय व्यवस्था बनाना है। ऐसा करते हुए, संसद ने राज्य विधानसभाओं के टैक्स लगाने के अधिकारों में दखल दी है और संविधान के तहत केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के बंटवारे पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं।
संवैधानिक सवाल – केंद्र और राज्यों की शक्तियाँ:
इस संशोधन अधिनियम का आधार सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच का 25.07.2024 का फ़ैसला है, जो ‘मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (‘MADA’) बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया’ मामले में आया था। कोर्ट ने कहा था कि संविधान की राज्य सूची (State List) में एंट्री 50 के तहत, राज्यों को मिनरल अधिकारों पर टैक्स लगाने का पूरा और विशेष अधिकार है। लेकिन संसद, मिनरल डेवलपमेंट से जुड़े कानून के ज़रिए राज्यों की ऐसी टैक्स लगाने की शक्तियों पर रोक लगा सकती है, जिसमें पूरी तरह से पाबंदी लगाना भी शामिल है। 2026 का संशोधन, 2024 के फ़ैसले से मिले इसी आधार का इस्तेमाल करता है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि मिनरल वाली ज़मीन राज्य सूची की एंट्री 49 के तहत आती है, और राज्यों को उस पर मिनरल के उत्पादन की मात्रा या देय रॉयल्टी के आधार पर टैक्स लगाने का अधिकार है। एंट्री 50 के उलट, एंट्री 49 पर संसद कोई पाबंदी नहीं लगा सकती है। इसलिए, संसद के किसी दखल के बिना मिनरल वाली ज़मीन पर टैक्स लगाना पूरी तरह से राज्य विधानसभाओं के अधिकार क्षेत्र में आता है।
हालाँकि, इस संशोधन से मिनरल अधिकारों या मिनरल वाली ज़मीन पर टैक्स लगाने के राज्यों के अधिकार पर पाबंदी लगा दी गई है। अलबत्ता, राज्य लेवी वसूल कर सकते हैं लेकिन वह केन्द्र द्वारा तय मानकों के अधीन। यह एंट्री 50 की भावना के खिलाफ़ है, क्योंकि संसद को राज्यों की शक्तियों को सीमित करने का अधिकार मिला है परंतु राज्य ऐसी सीमा तक लेवी वसूल कर सकते थे लेकिन, अब मिनरल अधिकारों पर टैक्स लगाने का अपना अधिकार राज्य तभी इस्तेमाल कर सकते हैं जब केंद्र सरकार की शर्तों और पाबंदियों का वे पालन करे। इस तरह एंट्री 50 राज्यों के लिए बेअसर हो जाती है। साथ ही, 2026 के संशोधन में मिनरल वाली ज़मीन की परिभाषा ऐसी है कि केंद्र सरकार अपने पैमाने लागू कर के कह दे, कि यह मिनरल वाली ज़मीन है। उसके बाद कोई भी मिनरल वाली ज़मीण पर केन्द्र का कब्ज़ा हो जाता है। यह संविधान राज्यों की शक्तियों के खिलाफ़ है क्योंकि एंट्री 49 किसी भी तरह से केंद्र के अधीन नहीं है, और क्योंकि केंद्रीय विधायिका, केंद्रीय कार्यपालिका द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार मिनरल वाली ज़मीन की परिभाषा नहीं बदल सकती।
कोर्ट ने अपने 2024 के फ़ैसले में यह भी कहा था कि राज्य सरकारें 1 अप्रैल, 2005 से शुरू होने वाली अवधि के लिए टैक्स की माँग कर सकती हैं, भुगतान की किश्तें बनानी होंगी। इस संशोधन से टैक्स की ये मांगें अमान्य हो गई हैं, जिससे सरकारी और प्राइवेट माइनिंग कंपनियों को फ़ायदा हुआ है, उनका बकाया माफ़ कर दिया गया है। लेकिन कोई कानून सिर्फ़ “किसी भी अदालत के फ़ैसले, आदेश या डिक्री में कुछ भी लिखा हो, उसके बावजूद…” ऐसा कह देने से अदालत के फ़ैसले को नहीं बदल सकता। हर नये कानून को फ़ैसले के आधार को बदलना होगा। यह संशोधन 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के आधार को नहीं बदल रहा है। कोर्ट ने संविधान के तहत जो माइनिंग अधिकारों और मिनरल वाले क्षेत्रों के बारे में केंद्र और राज्यों की शक्तियों की व्याख्या के आधार पर अपना फैसला दिया था।
2026 का संशोधन उन राज्यों को फ़ायदा देता है जिन्होंने 1 अप्रैल, 2005 से पुराने टैक्स इकट्ठा कर लिया, जबकि जिन राज्यों ने ऐसा नहीं किया, या जो अभी भी ऐसा करने की प्रक्रिया में हैं, वे अब अपनी आमदनी खो रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 14 में कानून के सामने समानता की गारंटी दी गई है लेकिन यहाँ तो इसका कुले आम उल्लंघन हो रहा है, जिसे चुनौती ज़रीर मिलेगी।
खनिज-समृद्ध राज्यों पर संभावित असर
2026 का संशोधन राज्यों से टैक्स लगाने की शक्तियां छीन लेता है और उन्हें माइनिंग से मिलने वाली आय बंद हो जाती है, जिसका असर यह है कि मानव विकास और सामाजिक कल्याण के लिए काम करने की राज्यों की गुंजाईश ख़त्म हो जाएगी।। उदाहरण के लिए, ‘झारखंड मिनरल-बेयरिंग लैंड सेस एक्ट’ की वैधता अब समाप्त हो गई} राज्य ने यह कानून बनाकर 2025-26 में 13,442 करोड़ रुपये कमाए थे; यह राज्य के नॉन-टैक्स रेवेन्यू का 68% और कुल रेवेन्यू प्राप्तियों का 11% था। इस अधिनियम में ऐसा प्रावधान था कि कि रेवेन्यू का इस्तेमाल केवल स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, कृषि, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, पीने के पानी और स्वच्छता को बेहतर बनाने के लिए किया जाए। ‘ओडिशा रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर एंड सोशियो-इकोनॉमिक डेवलपमेंट एक्ट, 2004’ (ORISED एक्ट) ने खनिज-युक्त ज़मीनों के सालाना मूल्य पर 20 प्रतिशत तक का टैक्स लगाया था। इस रेवेन्यू का इस्तेमाल राज्य सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे में सुधार और विकास, उत्पादन कार्यक्रमों को लागू करने, और ग्रामीण इलाकों, पिछड़े इलाकों और माइनिंग वाले इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और रोज़गार को बढ़ावा देने के लिए किया जाना था। माइनिंग कंपनियों की कानूनी चुनौती के बाद 2005 में ओडिशा हाई कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। जब मामला लंबित था, तब सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फ़ैसले ने उम्मीद जगाई कि अगर कोर्ट ORISED एक्ट को भी सही ठहराता है, तो ओडिशा को 12 सालाना किश्तों में लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का बकाया मिलेगा, और राज्य ORISED टैक्स के ज़रिए हर साल अतिरिक्त 12,000 करोड़ रुपये जुटा सकेगा। 2026 के संशोधन ने बकाया और अतिरिक्त सालाना रेवेन्यू मिलने की संभावना को खत्म कर दिया है।
खनिज संपदा वाले राज्यों को अब आमदनी को टिकाए रखने के लिए के लिए खनिज उत्पादन बढ़ाने की ओर धकेला जाएगा। इसका एक उदाहरण ओडिशा है, जहां 2021-22 से माइनिंग रेवेन्यू लगातार बढ़ा है और इसके… रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। 2026-27 में यह ₹53,000 करोड़ होगा, जो राज्य की गैर-कर आय का 75% हिस्सा होगा। आय में यह बढ़ोतरी माइनिंग लीज़ के नवीनीकरण और नए मिनरल ब्लॉक की नीलामी से हुई है, न कि अतिरिक्त लेवी (शुल्क) लगाने से। ओडिशा ने 79 मिनरल ब्लॉक की नीलामी की और 2020-21 से 2025-26 के बीच प्रीमियम के तौर पर लगभग ₹87,000 करोड़ कमाए।
माइनिंग कंपनियों के वारे न्यारे
जब सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में अपना फ़ैसला सुनाया, तो फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन माइनिंग इंडस्ट्रीज़ (FIMI) ने शिकायत की थी कि बकाया टैक्स के कारण माइनिंग इंडस्ट्री को ₹1.5 लाख करोड़ से ₹2 लाख करोड़ का नुकसान हो सकता है।टाटा स्टील ने बताया कि उसे ओडिशा को पिछली तारीख से लागू होने वाले टैक्स के तौर पर लगभग ₹17,347 करोड़ चुकाने पड़ सकते हैं। इस संशोधन के द्वारा उन कंपनियों का बकाया माफ़ कर दिया गया है जिन्होंने अभी तक भुगतान नहीं किया है, इतना ही नहीं उनके भविष्य के कामकाज पर टैक्स का बोझ भी कम हो रहा है।
माइनिंग कंपनियों का तर्क अब सरकार 2026 के संशोधन के बचाव में दोहरा रही है कि राज्यों को माइनिंग पर कोई अतिरिक्त लेवी लगाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि मिनरल की नीलामी का प्रीमियम, केंद्र सरकार द्वारा लगाई गई पूरी रॉयल्टी और डिस्ट्रिक्ट मिनरल फ़ाउंडेशन फ़ंड राज्यों को मिलते हैं। अगर मिनरल वाली ज़मीन का तेज़ी से अधिग्रहण किया जाए, ज़्यादा माइनिंग ब्लॉक की नीलामी की जाए, और जीतने वाली कंपनियों को पर्यावरण, वन और वन्यजीव मंज़ूरी जल्द से जल्द दिलाने में मदद की जाए, ताकि बिना देरी के उत्पादन शुरू हो सके, तो इन स्रोतों से मिलने वाली आय भी बढ़ेगी। राज्य सरकारों को यह संदेश दिया जा रहा है कि अगर आपको अपनी आय कम नहीं देनी है या बढ़ानी है तो कम से कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा इलाके में माइनिंग और मिनरल का उत्पादन बढ़ाओ। इससे माइनिंग कंपनियों को ज़्यादा और जल्दी मुनाफ़ा मिलेगा।
प्रकृति पर निर्भर प्राथमिक उत्पादकों पर असर:
माइनिंग के नियमों में ढील देना 2015 से शुरू हुआ और लगातार तेज़ी से बढ़ रहा है। पर्यावरण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कानूनों और नियमों, जैसे कि वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980; पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 में भी ढील दी गई है; राज्य सरकारों द्वारा ‘वन अधिकार अधिनियम, 2006 -FRA) और ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA)’ को लागू न करना और उनका उल्लंघन करना; साथ ही ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनःस्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’ की अनदेखी करना।
कानूनों को कमजोर करने के अलावा, राज्य सरकारें ‘अनुसूची-5’ वाले क्षेत्रों में कानूनों का खुलेआम उल्लंघन करती हैं। वे निजी कंपनियों को जमीन पट्टे पर देकर खनन को बढ़ावा देती हैं, जिसमें ग्राम सभाओं से सलाह-मशविरा नहीं किया जाता या उनकी सहमति के बारे में झूठी जानकारी दी जाती है। ग्राम सभा की आपत्तियों के बावजूद जबरन जमीन का अधिग्रहण किया जाता है, पुलिस द्वारा डराया-धमकाया जाता है और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जाता है। FRA (वन अधिकार अधिनियम) का अक्सर उल्लंघन होता है: अधिकारों के दावों को कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना बड़े पैमाने पर खारिज कर दिया जाता है; अधिकारों को मान्यता देने या ग्राम सभा की सहमति लेने जैसी अनिवार्य शर्तों को पूरा किए बिना खनन परियोजनाओं के लिए वन भूमि का अवैध रूप से इस्ते¬¬माल किया जाता है; पहले से दिए गए वन अधिकारों को पिछली तारीख से रद्द कर दिया जाता है; और पूरक वनीकरण के लिए वननिवासियों को वन भूमि से बेदखल करके कहीं खदेड दिया जाता है।
माइनिंग में नियम-कानून में ढील और उदारीकरण के साथ-साथ सुरक्षा कानून और नियमों को कमज़ोर करने और उनका उल्लंघन करने का नतीजा यह हुआ कि 2011-12 और 2024-25 के बीच मिनरल के उत्पादन में 57% की बढ़ोतरी हुई। वहीं, 2008-09 और 2022-23 के बीच, लगभग 60,000 हेक्टेयर जंगल की ज़मीन माइनिंग के लिए इस्तेमाल की गई। 2014-15 और 2023-24 के बीच, 40,000 हेक्टेयर से ज़्यादा जंगल की ज़मीन माइनिंग और उत्खनन के लिए इस्तेमाल की गई। माइनिंग की वजह से शारीरिक रूप से विस्थापित हुए लोगों की संख्या, या अपनी रोज़ी-रोटी खोने वाले लोगों की संख्या के लिए कोई केंद्रीय देशव्यापी आधिकारिक गिनती उपलब्ध नहीं है। 1960 और 2000 के बीच विस्थापन का एकेडमिक अनुमान 15 लाख से 25.5 लाख तक है। भारत में लगभग एक-चौथाई आदिवासी समुदायों के पारंपरिक रहने की जगहें, जिनकी कुल आबादी 2.6 करोड़ है, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड की सीमाओं के अंदर हैं। भारत के 70 प्रतिशत कोयला भंडार इन्हीं तीन राज्यों में पाए जाते हैं। यह एक अजीब बात है कि जिन इलाकों में संसाधन बहुत ज़्यादा हैं, वहीं सबसे ज़्यादा हाशिए पर रहने वाले लोग भी रहते हैं। इसी “संसाधन अभिशाप” को 2024 के फैसले ने पलटने की कोशिश की थी।
इस संदर्भ में, 2026 का संशोधन, जिसमें माइनिंग बढ़ाने और कम से कम समय में ज़्यादा उत्पादन पर ज़ोर दिया गया है, जल-जंगल-ज़मीन और उन पर निर्भर मुख्य उत्पादकों – आदिवासियों और दूसरे पारंपरिक जंगल में रहने वालों, मेहनतकश किसानों, पारंपरिक मछुआरों और पशुपालकों – की रोज़ी-रोटी को और ज़्यादा नुकसान पहुँचाएगा। पुराने जंगलों, आम ज़मीनों और खेती की ज़मीनों के बड़े हिस्से जो हरियाली से ढके हुए हैं, उनके खत्म होने से नदियों का प्रवाह और झीलों में पानी की कमी हो जाएगी या तो बाढ़ जैसी स्थिति पैदा ह्गी। इससे भूगर्भ जल स्रोत भी बच नहीं पाएंगे। खदानों के आस-पास के इलाकों में भी जैविक विविधता हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी। कीमती कार्बन सिंक और क्लाइमेट बफ़र्स को नुकसान होने से पर्यावरणीय़ परिवर्तन ज़्यादा कठोर हो जाएगा और इसके हिसाब से ढलने की क्षमता कम हो जाएगी, जिसका असर सिर्फ़ सीधे माइनिंग से प्रभावित लोगों के अलावा बड़ी आबादी पर पड़ेगा। माइनिंग का बेतहाशा विस्तार, शोषणकारी पूँजीवादी मानवयुग का हिस्सा है, जिसके ऐसे नतीजे होंगे जिन्हें बदला नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए, भारत में कोयला माइनिंग वाले इलाकों से मिली जानकारी से पता चलता है कि मिट्टी की ऊपरी परत लगातार कम हो रही है, मिट्टी जम रही है, नमी कम हो रही है और मिट्टी के ऑर्गेनिक कार्बन में काफी कमी आ रही है। क्रोमियम और सीसा जैसे ज़हरीले तत्वों से बड़े पैमाने पर गंदगी, साथ ही खान से निकलने वाले एसिडयुक्त प्रवाहियों से, मिट्टी की क्वालिटी बिगड़ रही है। सेंट्रल इंडियन कोलफील्ड्स के समूचे क्षेत्र को देखें तो, जंगलों और जलागारों में पानी की जगहों में भारी कमी दिख रही है, साथ ही माइनिंग पिट्स, ओवरबर्डन डंप्स और ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भी बढ़ रहे हैं जो हैबिटैट को तोड़ रहे हैं और हाइड्रोलॉजी को बिगाड़ रहे हैं।
संशोधन के खिलाफ़ रणनीति आधारित लामबंदी:
मिनरल से भरपूर राज्यों में आंदोलनों और संगठनों को अमेंडमेंट को रद्द करवाने के लिए रणनीतिक से लामबंदी करनी चाहिए। हर राज्य में, आदिवासियों और दूसरे पारंपरिक जंगलवासियों, मेहनतकश किसानों, मछुआरों और पशुपालकों के संगठनों को इस मकसद के लिए एक साझा मंच पर आना चाहिए और इस संशोधन पैदा होने वाले खतरों को बड़े पैमाने पर फैलाया जाना चाहिए। राज्य सरकारों को सुप्रीम कोर्ट में इस नये क़ानून को चुनौती देने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। संशोधन का मकसद तो राज्यों को कम से कम समय में खनिज उत्पादन बढ़ाने के लिए मजबूर करना है,लेकिन इसके जवाब में आंदोलनों का मक़सद राज्य सरकार को सालाना उत्पादन पर एक सीलिंग लगाने को मजबुर करने का होना चाहिए। यह उन खास सिद्धांतों के मुताबिक है जिनका सुप्रीम कोर्ट ने गोवा माइनिंग केस और बेल्लारी गैर-कानूनी माइनिंग केस में पालन किया था, जो 1992 में पर्यावरण और विकास पर UN कॉन्फ्रेंस के रियो डिक्लेरेशन से लिए गए थे:
1. सावधानी का सिद्धांत: जहाँ ऐसा गंभीर नुकसान होने का खतरा हो जिसे ठीक न किया जा सके, वहाँ यह बहाना नहीं चलना चाहिए कि पूरी वैज्ञानिक जानकारी की कमी थी। पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए कम खर्चीले उपायों को लागू करने में राज्य सरकारें कोताही नहीं बरत सकतीं। इसके लिए माइनिंग पर प्रतिबंध या रोक भी लगाना ज़रूरी हो तो ऐसी माँग भी उठानी चाहिए।
2. पीढ़ियों के बीच बराबरी का सिद्धांत: विकास का अधिकार न सिर्फ आज की बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भी है, इसलिए खनिजों को और ज़िम्मेदार तरीके से निकालने की ज़िम्मेदारी है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी राज्य की प्राकृतिक संपदा का मज़ा ले सकें।
3. टिकाऊ विकास का सिद्धांत: आर्थिक विकास और पर्यावरण की देखभाल के बीच एक संतुलन बनाना होगा।
4. ‘प्रदूषक करे भुगतान’ का सिद्धांत: प्रदूषण फैलाने वाले को, सिद्धांत रूप में, जनता के हित का ध्यान रखते हुए प्रदूषण का खर्च उठाना चाहिए। माइनिंग लीज़होल्डर्स को माइनिंग से खराब हुई ज़मीनों को ठीक करने का वित्तीय बोझ उठाना चाहिए, सभी खदानों के लिए ज़रूरी सुधार और पुनर्वास प्लान बनाकर इलाके की इकोलॉजी को ठीक करना चाहिए।
इसके अलावा, जन-आंदोलनों को PESA और FRA को लागू करवाना, उनके उल्लंघन का विरोध करना चाहिए और EIA को कमज़ोर करने का विरोध करना चाहिए। राज्य सरकारों से अपने राज्य के जंगल कानूनों में बदलाव करने की अपील की जानी चाहिए। वन भूमि के अन्य कार्यों में उपयोग (डायवर्जन) के प्रस्तावों के लिए FRA (वन अधिकार अधिनियम) का पालन करना ज़रूरी बनाना चाहिए।
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