— परिचय दास —
11 सितंबर को विनोबा भावे की जयंती थी । इस अवसर पर विनोबा को केवल फूलों से याद करना थोड़ा कम याद करना होता। मुझे लगा, उन्हें याद करने के लिए शायद इस शांत दोपहर में विनोबा जी की पुस्तक ~‘गीता प्रवचन’ के पन्ने खोलने चाहिए। वहाँ एक पुस्तक नहीं, एक आवाज मिलती है। बहुत ऊँची नहीं, बहुत चामत्कारिक भी नहीं। जैसे कोई अपना आदमी पास बैठकर धीरे-धीरे कोई पुरानी बात सुना रहा हो और सुनाते-सुनाते पता ही न चले कि वह बात उसकी है या हमारी।
विनोबा की ‘गीता प्रवचन’ पुस्तक ( जो जेल में गीता पर उनके दिए प्रवचनों का संग्रह है ) को पढ़ते हुए सबसे पहले यही अनुभव होता है कि गीता उनके पास किसी राजसी ग्रंथ की तरह नहीं आई थी। वह उनके जीवन में धीरे-धीरे उतरी थी, जैसे सुबह का उजाला किसी कमरे में बिना शोर किए उतरता है। पहले खिड़की की चौखट पर, फिर फर्श पर, फिर कमरे की दीवारों पर। अंत में पता चलता है कि अँधेरा कहीं बचा ही नहीं।
गीता उनके लिए पढ़ी जाने वाली पुस्तक से अधिक साथ रहने वाली पुस्तक थी।
कुछ पुस्तकें हम पढ़ते हैं और अलमारी में रख देते हैं। कुछ पुस्तकें हमें पढ़ती रहती हैं। ‘गीता प्रवचन’ दूसरी तरह की पुस्तक है। उसे पढ़ते हुए लगता है कि विनोबा कहीं सामने बैठे हैं और बीच-बीच में हमारी ओर देख रहे हैं। वे कोई कठिन बात कहकर हमें चकित नहीं करना चाहते। उनके पास चमत्कारों की कोई दुकान नहीं है। वे तो जैसे जीवन की छोटी-छोटी गाँठें खोलते चलते हैं।
गीता का अर्जुन उनके यहाँ बहुत दूर का पात्र नहीं रह जाता। वह हमारे घर का, हमारे समय का, हमारे भीतर का आदमी बन जाता है। वह जो निर्णय के सामने खड़ा है और जिसके हाथ में सब कुछ होते हुए भी मन काँप रहा है। वह जो अपने ही लोगों के बीच खड़ा होकर अचानक अकेला पड़ गया है। वह जो जानता बहुत कुछ है, लेकिन उस क्षण अपने ज्ञान पर भरोसा नहीं कर पा रहा।
विनोबा को शायद इसी अर्जुन में मनुष्य की सबसे सच्ची तस्वीर दिखाई देती थी।
मनुष्य जब बहुत निश्चित होता है, तब वह अक्सर कम मानवीय होता है। उसकी असली पहचान उसके संशय में होती है। जहाँ प्रश्न उठता है, वहीं भीतर कोई दरवाजा खुलता है। अर्जुन का विषाद इसलिए विनोबा की दृष्टि में केवल कमजोरी नहीं लगता। उसमें मनुष्य के जागने की शुरुआत है।
और कृष्ण?
कृष्ण यहाँ केवल उपदेश देने वाले नहीं हैं। वे जैसे किसी अँधेरे कमरे में धीरे-धीरे दीपक जला रहे हैं। अर्जुन के प्रश्न खत्म नहीं किए जाते; उनकी आँखों के सामने का अँधेरा कम किया जाता है। यही ‘गीता प्रवचन’ का एक बड़ा साहित्यिक आकर्षण है। विनोबा गीता को किसी दूर बैठे देवता की आवाज बनाकर नहीं छोड़ते। वे उसके संवाद को मनुष्य के जीवन में फिर से जीवित कर देते हैं।
गीता का कुरुक्षेत्र भी उनके यहाँ केवल कुरुक्षेत्र नहीं रहता। वह खेत हो सकता है, घर हो सकता है, रास्ता हो सकता है, कार्यालय हो सकता है, समाज हो सकता है। वह वह जगह है जहाँ मनुष्य को अपने हिस्से का काम करना पड़ता है और जहाँ कोई कृष्ण सामने दिखाई नहीं देता। कभी-कभी तो अपना अर्जुन भी दिखाई नहीं देता। केवल बेचैनी दिखाई देती है।
विनोबा की सुंदरता यहीं है कि वे इस बेचैनी को किसी भारी शब्द में नहीं बदलते। वे उसे जीवन के पास ही रहने देते हैं।
उनकी गीता में बड़े-बड़े विचार हैं, लेकिन वे विचार अपने पाँवों में खड़ाऊँ पहने हुए हैं। वे जमीन पर चलते हैं। उनमें आश्रम की धूल है, गाँव की पगडंडी है, चूल्हे का धुआँ है, चरखे की आवाज है, खेत की मिट्टी है। शास्त्र उनके यहाँ आकाश में टँगा हुआ नहीं रहता। वह धरती पर उतर आता है।
शायद यही कारण है कि विनोबा को पढ़ते हुए गीता कभी-कभी पुस्तकालय से निकलकर रसोईघर में चली आती है।
वहाँ कोई स्त्री चुपचाप काम कर रही है। कोई किसान दिन भर की थकान लेकर लौट रहा है। कोई विद्यार्थी परीक्षा के पहले किताब बंद करके छत की ओर देख रहा है। कोई बूढ़ा अपने बीते हुए जीवन का हिसाब लगा रहा है। कोई आदमी अपनी छोटी-सी सफलता पर भीतर ही भीतर फूल रहा है और कोई अपनी छोटी-सी असफलता से इतना टूट गया है जैसे संसार समाप्त हो गया हो।
गीता इन सबके बीच बैठ सकती है।
विनोबा की दृष्टि में उसका यही अपनापन है।
‘गीता प्रवचन’ को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि विनोबा शब्दों के पीछे छिपी हुई हवा को पकड़ना चाहते हैं। कोई श्लोक उनके लिए केवल श्लोक नहीं है। उसके भीतर से कोई जीवन-स्पंदन निकलता है। वे उस स्पंदन को पकड़ते हैं और उसे अपनी भाषा में रखते हैं। इसलिए उनकी भाषा में शास्त्रीयता का बोझ नहीं, आत्मीयता का ताप है।
उनका गद्य कहीं-कहीं ऐसा लगता है जैसे किसी पुराने संत की वाणी और किसी आधुनिक मनुष्य की बेचैनी एक ही जगह आकर बैठ गई हो।
विनोबा की सबसे बड़ी विशेषता शायद यह है कि वे गीता को छोटा नहीं करते, फिर भी उसे डरावना नहीं रहने देते।
धर्मग्रंथों के साथ अक्सर एक समस्या हो जाती है। हम उन्हें इतना ऊँचा उठा देते हैं कि उनके पास जाना कठिन हो जाता है। विनोबा ने गीता को ऊँचाई से उतारकर मनुष्य के पास बैठा दिया। अब वह सामने है। उससे बात की जा सकती है। उससे असहमति भी की जा सकती है, अपने प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं।
और यही किसी महान पुस्तक की असली गरिमा है कि वह अपने पाठक को छोटा नहीं करती।
विनोबा की गीता में कर्म की चर्चा आती है तो ऐसा नहीं लगता कि कोई अध्यापक कक्षा में बैठकर पाठ पढ़ा रहा है। वहाँ जीवन की हलचल है। कोई काम कर रहा है, कोई खेत जोत रहा है, कोई सेवा कर रहा है, कोई अपने हाथ से अपना संसार बना रहा है। कर्म का सौंदर्य तभी खुलता है जब उसमें मनुष्य की देह भी शामिल हो।
गीता का कर्मयोग विनोबा के यहाँ पसीने की गंध से जुड़ जाता है।
यह बहुत महत्त्वपूर्ण बात है।
हमारे यहाँ अध्यात्म को अक्सर देह से अलग करके देखने की आदत रही है। जैसे आत्मा बहुत ऊँची चीज है और शरीर कोई असुविधाजनक सामान, जिसे किसी तरह ढोते रहना है। विनोबा की साधना में ऐसा अलगाव नहीं है। हाथ काम करते हैं, पैर चलते हैं, मन सोचता है, हृदय महसूस करता है और इन सबके बीच मनुष्य धीरे-धीरे अपने को पहचानता है।
इसीलिए उनका आध्यात्मिक संसार बहुत सूखा नहीं है।
उसमें मनुष्य है।
उसमें मिट्टी है।
उसमें भूख है।
उसमें श्रम है।
उसमें प्रेम है।
और सबसे बढ़कर उसमें दूसरे मनुष्य के लिए जगह है।
शायद ‘गीता प्रवचन’ का सौंदर्य इसी जगह सबसे अधिक खिलता है। विनोबा जब गीता की बात करते हैं तो अपने सामने बैठे हुए पाठक को केवल आत्मा मानकर संबोधित नहीं करते। वे उसे पूरा मनुष्य मानते हैं, उसकी कमजोरियों सहित।
मनुष्य को क्रोध आता है। उसे मोह होता है। उसे अपनी प्रशंसा अच्छी लगती है। वह हार से दुखी होता है। वह दूसरों से ईर्ष्या करता है। कभी वह बहुत ऊँचा सोचता है और अगले ही क्षण बहुत छोटा व्यवहार कर बैठता है। विनोबा इस मनुष्य से नाराज नहीं होते। वे उसे सुधारने की जल्दी में भी नहीं दिखाई देते। वे जैसे उसका हाथ पकड़कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं।
यही उनकी वाणी में एक दुर्लभ कोमलता पैदा करता है।
उनकी गीता में त्याग है, लेकिन वह सूखी तपस्या नहीं है। उसमें जीवन के प्रति वितृष्णा नहीं है। संसार कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे फेंककर मुक्ति मिल जाए। बल्कि संसार के बीच रहते हुए अपने भीतर के लोभ, अहंकार और अधिकार-बोध को थोड़ा-थोड़ा ढीला करना है।
यहाँ विनोबा का जीवन उनकी गीता के शब्दों में घुला हुआ दिखाई देता है।
भूदान आंदोलन को याद कीजिए।
किसी साधु का गाँव-गाँव घूमना और जमीन माँगना अपने आप में विचित्र दृश्य है। हाथ में न सेना, न सत्ता, न कोई सरकारी आदेश। केवल एक विश्वास कि मनुष्य के भीतर बाँटने की इच्छा अभी पूरी तरह मरी नहीं है। किसी के पास जमीन है और किसी के पास जमीन नहीं। प्रश्न केवल जमीन का नहीं, मनुष्य के भीतर जगह बनाने का है।
विनोबा की यह यात्रा ‘गीता प्रवचन’ से अलग नहीं लगती। जैसे पुस्तक के पन्ने उठकर पाँवों में बदल गए हों।
किसी गाँव की धूल भरी पगडंडी पर चलते हुए विनोबा और उनके सामने बैठे किसान। यह दृश्य ‘गीता’ के किसी श्लोक से अधिक जीवित लगता है। वहाँ शास्त्र की व्याख्या नहीं हो रही, शास्त्र अपना अगला वाक्य स्वयं लिख रहा है।
शायद यही कारण है कि विनोबा को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं। उन्हें चलते हुए देखना पड़ता है।
उनकी चाल में एक ऐसी शांति थी जो निष्क्रियता की शांति नहीं थी। वह उस आदमी की शांति थी जिसे अपने रास्ते पर बहुत दूर तक चलना है और जिसे हर मोड़ पर अपनी प्रसिद्धि की जरूरत नहीं।
‘गीता प्रवचन’ इसी चाल की पुस्तक है।
वह तेज नहीं चलती।
वह पाठक को दौड़ाती नहीं।
वह साथ चलती है।
कभी आगे निकल जाती है, कभी पीछे रुकती है और कभी किसी पेड़ की छाया में बैठ जाती है।
और पाठक, जो शुरू में सोचता है कि वह गीता पढ़ रहा है, कुछ देर बाद महसूस करता है कि गीता उसके जीवन को पढ़ रही है।
यही पढ़े जाने का अनुभव साहित्य को जन्म देता है।
विनोबा की भाषा का एक सौंदर्य यह भी है कि उसमें अनावश्यक प्रदर्शन नहीं है। वे अपने ज्ञान का भार पाठक पर नहीं रखते। जैसे किसी को नदी दिखाने वाला व्यक्ति नदी का पूरा भूगोल सुनाने के बजाय चुपचाप किनारे खड़ा हो और कहे, देखिए, पानी बह रहा है।
गीता उनके यहाँ ऐसी ही बहती हुई नदी है।
उसमें उतरना है तो उतरिए।
किनारे बैठना है तो बैठिए।
दूर से देखना है तो देखिए।
लेकिन पानी को केवल परिभाषित करते रहने से प्यास नहीं बुझेगी।
शायद यही विनोबा की पूरी साधना का सौंदर्य है। वे जीवन को परिभाषित करने के बजाय उसे छूना चाहते हैं।
इसीलिए ‘गीता प्रवचन’ में दर्शन भी जब आता है तो वह दार्शनिक मुद्रा में नहीं आता। वह किसी फूल पर पड़ी ओस की तरह आता है। दिखाई देता है, लेकिन अपने होने की घोषणा नहीं करता।
विनोबा को पढ़ते हुए कई बार लगता है कि वे बहुत बड़ी बातें कहकर भी मनुष्य को बहुत साधारण बना देना चाहते हैं। साधारण, लेकिन छोटा नहीं। वे मनुष्य को उसके मूल जीवन में लौटाना चाहते हैं।
काम करो।
चलो।
सेवा करो।
अपने भीतर झाँको।
दूसरे के दुःख को अपने दुःख से बिल्कुल अलग मत समझो।
अपने किए हुए काम का ढोल मत पीटो।
और यदि कभी तुम्हें लगे कि तुम बहुत बड़े हो गए हो, तो किसी गाँव की पगडंडी पर चले जाओ। मिट्टी तुम्हें तुम्हारा आकार बता देगी।
विनोबा की गीता में यही मिट्टी बार-बार लौटती है।
उनका जन्मदिन इसलिए भी सुंदर अवसर है कि हम उस आदमी को याद करें जिसने गीता को केवल शब्दों में नहीं रखा। उसने उसे अपने चलने, बोलने, मिलने और बाँटने में जगह दी।
11 सितंबर को विनोबा की स्मृति आती है तो ‘गीता प्रवचन’ का कोई पन्ना खोलना एक तरह से उनके पास बैठना है। पुस्तक खुलती है और लगता है, अभी वे आएँगे। अपनी परिचित सादगी में बैठेंगे। कोई बहुत बड़ी घोषणा नहीं करेंगे। शायद किसी छोटे-से प्रश्न से बात शुरू करेंगे और धीरे-धीरे वह प्रश्न हमारे भीतर कहीं गहरे उतर जाएगा।
फिर हम पुस्तक बंद कर देंगे।
कमरा वैसा ही रहेगा।
कुर्सी वैसी ही रहेगी।
बाहर की दुनिया भी वैसी ही रहेगी।
लेकिन भीतर कुछ थोड़ा-सा बदल चुका होगा।
शायद यही किसी पुस्तक की सबसे बड़ी सफलता है।
वह हमें ज्ञान से भर दे, यह जरूरी नहीं।
वह हमें थोड़ा अधिक मनुष्य बना दे, इतना पर्याप्त है।
विनोबा की ‘गीता प्रवचन’ ऐसी ही पुस्तक है। उसे पढ़कर लगता है कि गीता बहुत दूर किसी प्राचीन युद्धभूमि में नहीं, हमारे आज के जीवन में भी घट रही है। अर्जुन आज भी है। उसका संशय आज भी है। उसका मोह आज भी है। कृष्ण की आवाज भी शायद कहीं है, लेकिन उसे सुनने के लिए बाहर का शोर थोड़ा कम करना होगा।
विनोबा ने अपने जीवन में उस आवाज को सुनने की कोशिश की थी।
और शायद उनकी जन्मतिथि पर उन्हें याद करने का सबसे सुंदर ढंग यही है कि हम उनके शब्दों के सामने थोड़ी देर बैठें और अपने भीतर पूछें कि हमारे जीवन का कुरुक्षेत्र कहाँ है, हमारी बेचैनी किस बात की है और हमारे हाथों में रखा हुआ कर्म किसका इंतजार कर रहा है।
गीता का सौंदर्य तब खुलता है जब वह ग्रंथ से जीवन बन जाती है।
विनोबा का सौंदर्य तब खुलता है जब उनका जीवन किसी विचार की मिसाल न रहकर एक शांत, चलते हुए मनुष्य की छवि बन जाता है।
एक ऐसा मनुष्य जो बहुत कुछ जानता था, लेकिन जानने से अधिक जीने पर विश्वास करता था।
एक ऐसा मनुष्य जिसके पास कहने के लिए गीता थी, लेकिन जिसके जीवन में कहने से अधिक करने की आवाज थी।
एक ऐसा मनुष्य जो चला गया, पर अपनी पुस्तक के पन्नों में आज भी धीरे-धीरे चलता हुआ दिखाई देता है।
और हम, उसके पीछे-पीछे, शायद पहली बार समझते हैं कि गीता केवल पढ़ने की चीज नहीं है।
कभी-कभी वह किसी मनुष्य की तरह हमारे पास आती है।
बैठती है।
चुप रहती है।
फिर धीरे से पूछती है—
अब बताओ, तुम्हें अपने जीवन में क्या करना है?
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