जीने की कला में छेद – डॉ योगेन्द्र
निराला ने एक कविता लिखी है- ‘स्नेह निर्झर बह गया है।’ उस कविता की कुछ पंक्तियां हैं -
‘स्नेह-निर्झर बह गया है !
रेत ज्यों तन...
विनोद कुमार शुक्ल को श्रद्धांजलि!
— परिचय दास —
।। एक ।।
विनोद कुमार शुक्ल का न रहना किसी एक व्यक्ति का न रहना नहीं है, यह उस मौन का उठ...
रिश्तों की मृत्यु कहीं आदमी की मृत्यु तो नहीं! – डॉ...
जापान में एक कंपनी है - फैमिली रोमांस। यह कंपनी लोगों को पिता, पति, दोस्त और अन्य रिश्तेदार उपलब्ध करवाती है। ऐसी कई पेशेवर...
साथी राजनीति प्रसाद नहीं रहे—समझ नहीं आ रहा, क्या-क्या याद करूँ!
— Prof. Raj Kumar Jain —
सेठों, साहूकारों, गद्दीनशीन नेताओं, सियासतदानों तथा अपने घर के बुज़ुर्गों और गुरुओं के नाम पर या उनकी स्मृति में...
समाजवादी आन्दोलन के दधीचि : सुरेंद्र मोहन
— डॉ. सुनीलम —
सुरेन्द्र मोहन जी के मेरी अंतिम बात फोन पर 16 दिसंबर 2010 की रात्रि को हुई थी। जिसमें उन्होंने मुझे 10...
मानवाधिकारः नया परिप्रेक्ष्य
— प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी —
मानवाधिकारों का एक अन्य क्षेत्र है जो जीवन-मूल्यों की प्रकृति और संरचनाओं से जुड़ा है। हमारे जीवन-मूल्यों का समूचा ढांचा...
पुनर्जागरण की जरूरत और पाखंडियों के स्वर – डॉ योगेन्द्र
विमल राय की एक फिल्म है -’सुजाता ‘। जब मैं महज एक वर्ष का था, तब यह फिल्म बनी थी यानी 1959 में। ब्लैक...
एक यादगार सभा ऐसी भी! – राजकुमार जैन
एक ऐसा इंसान, जिसके पास दुनियावी अर्थ में अपना कुछ भी नहीं था, शहर के कोलाहल से दूर गांव के जर्जर मकान के एक...
६ दिसंबर १९९२ की समीक्षा : तैंतीस बरस बाद
हर देश का अपना संस्कृति कोश होता है जो उसके स्मृति संसार के सुख-दुख की घटनाओं से पैदा विमर्श को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित...
समाजवादी कैसा जीवन जीएं; सिखा कर चले गए पन्नालाल सुराणा
— डॉ सुनीलम —
पन्नालाल सुराणा जी से मेरी पहली मुलाकात सुरेंद्र मोहन जी के साथ हुई थी। 1985 के बाद जब मैंने बैतूल में...

















