साथी राजनीति प्रसाद नहीं रहे—समझ नहीं आ रहा, क्या-क्या याद करूँ!
— Prof. Raj Kumar Jain —
सेठों, साहूकारों, गद्दीनशीन नेताओं, सियासतदानों तथा अपने घर के बुज़ुर्गों और गुरुओं के नाम पर या उनकी स्मृति में...
समाजवादी आन्दोलन के दधीचि : सुरेंद्र मोहन
— डॉ. सुनीलम —
सुरेन्द्र मोहन जी के मेरी अंतिम बात फोन पर 16 दिसंबर 2010 की रात्रि को हुई थी। जिसमें उन्होंने मुझे 10...
मानवाधिकारः नया परिप्रेक्ष्य
— प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी —
मानवाधिकारों का एक अन्य क्षेत्र है जो जीवन-मूल्यों की प्रकृति और संरचनाओं से जुड़ा है। हमारे जीवन-मूल्यों का समूचा ढांचा...
पुनर्जागरण की जरूरत और पाखंडियों के स्वर – डॉ योगेन्द्र
विमल राय की एक फिल्म है -’सुजाता ‘। जब मैं महज एक वर्ष का था, तब यह फिल्म बनी थी यानी 1959 में। ब्लैक...
एक यादगार सभा ऐसी भी! – राजकुमार जैन
एक ऐसा इंसान, जिसके पास दुनियावी अर्थ में अपना कुछ भी नहीं था, शहर के कोलाहल से दूर गांव के जर्जर मकान के एक...
६ दिसंबर १९९२ की समीक्षा : तैंतीस बरस बाद
हर देश का अपना संस्कृति कोश होता है जो उसके स्मृति संसार के सुख-दुख की घटनाओं से पैदा विमर्श को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित...
समाजवादी कैसा जीवन जीएं; सिखा कर चले गए पन्नालाल सुराणा
— डॉ सुनीलम —
पन्नालाल सुराणा जी से मेरी पहली मुलाकात सुरेंद्र मोहन जी के साथ हुई थी। 1985 के बाद जब मैंने बैतूल में...
क्या भारतीय मतदाता लाभार्थी बन चुका है? – परिचय दास
।। एक ।।
भारतीय राजनीति में कल्याण की अवधारणा कोई नई नहीं, पर उसके अर्थ, उसका प्रयोजन और उसका रूप पिछले एक दशक में जिस...
सादगी, निरहंकारिता, मिलनसारिता और जीवट व्यक्तित्व के प्रतीक थे रबि राय
— विज्ञान मोदी —
हिंदुस्तान के समाजवादी आंदोलन के प्रमुख नेता और डॉ. राममनोहर लोहिया के अनुयायी श्री रबि राय से मेरी पहली मुलाकात 22 दिसम्बर,...
सच्चिदाजीः सत्तावन का जज्बा और लीची की मिठास – अरुण कुमार...
किसी भी पढ़ने लिखने वाले और समाजवादी विचारों और मूल्यों में विश्वास करने वाले के लिए यह गर्व का विषय हो सकता है कि...

















