वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति और हमारा दायित्व

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Loktantrik rastra nirman abhiyan

विगत वर्ष 2025 के जुलाई में हमने अपने द्वितीय प्रांतीय सम्मेलन में प्रस्ताव पारित कर बिहार विधान सभा चुनाव में एन.डी.ए. सरकार को सत्ता से हटाने के लिये अभियान चलाने का निर्णय लिया था. निर्णयानुसार अपनी क्षमतानुसार भरपूर प्रयास किया गया, जिसका विवरण प्रदेश संयोजक के प्रतिवेदन में पेश किया गया है.

बिहार विधान सभा के चुनाव के परिणाम आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय रहे. उसके पश्चात विगत अप्रैल माह में सम्पन्न पश्चिम बंगाल के परिणाम ने साफ तौर पर स्पष्ट कर दिया कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘तंत्र’ ‘लोक’ पर हावी हो चुका है. लोकतंत्र में मतदाता सरकार को चुनते हैं. पर हाल के विधान सभा चुनावों से स्पष्ट हुआ कि अब हमारे देश में सरकार अपने हिसाब से मतदाता चुनने का विषाक्त और निकृष्ट तंत्र स्थापित कर चुकी है. इस तंत्र ने उच्चतम न्यायालय सहित सभी संवैधानिक संस्थानों को कब्जे में लेकर अनंत काल तक सत्ता में बने रहने का इंतेजाम मुकम्मल कर चुकी है. वर्तमान समय में दुनियाभर में दक्षिणपंथ और तानाशाही का अद्यतन स्वरूप उभार पर है. इक्कीसवीं सदी का स्वरूप बीसवीं सदी की तानाशाही से भिन्न है. आधुनिक समय में एकाधिकारवादी और तानाशाही तंत्र (सरकारों) के लिये मतदाताओं के समर्थन की ‘लेजिटिमेसी’ (वैधता) आवश्यक है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के इस संकट पर विस्तृत चर्चा और विमर्श की आवश्यकता है.

फिलहाल हमें इन परिस्थितियों में अपने राज्य बिहार की राजनीतिक स्थितियों तथा सामाजिक-आर्थिक विकास पर विचार करने और उसके लिये जद्दोजहद की रणनीति बनाने पर विमर्श करना जरूरी है. इसलिये कि मतदाता सूची से नाम काटकर अपने अनुरूप परिणाम प्राप्त करने के अपवित्र चलन का पहला प्रयोग भूमि बिहार को ही बनाया गया. केन्द्रीय सत्ता ने बिहार के प्रयोग के सकारात्मक परिणाम के आधार पर प. बंगाल के चुनाव में कें.चु.आ. के सहयोग से कुत्सित प्रणाली अपनायी और भारी बहुमत से सरकार में जबरदस्ती काबिज हो गयी.

बिहार विधान सभा के चुनाव परिणाम से भाजपा ने ये निष्कर्ष निकाले ?

1. 59 लाख मतदाताओं के नाम सूची से काट दिये जाने के बावजूद चुनाव संपन्न करा लिए गये और दलों और मतदाताओं की तरफ से कोई व्यापक प्रतिरोध नहीं हुआ. अतः इसे आगे बढ़ाया जा सकता है
2.चुनाव कानून में उल्लिखित आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन कर महिलाओं को 10-10 हजार रुपए बांटकर भी चुनाव संपन्न कराये जा सकते हैं. जिसपर न्यायपालिका भी रोक नहीं लगा सकती.
3.सामाजिक समीकरणों के रुझान के विपरीत भी मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम काटकर परिणाम अपने पक्ष में लाया जा सकता है.
4.’बिहार जैसे राज्य में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं हो सकता’ – इस नैरेटिव पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने का प्रयास सफल हो सकता है.
5.बिहार के पिछड़ेपन, बदहाली और पलायन के आधार पर गोलबंदी न होने देने में भाजपा सफल हो सकती है.

चुनाव परिणामों के बाद की राजनीति ने बिहार में एक नया मोड़ ले लिया है. 1980 में जन्मी भाजपा राज्य में आज तक अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पायी थी. पर इस बार नीतीश कुमार की पलटमार और अनैतिक राजनीति की अलोकप्रियता को औजार बनाकर सत्ता में काबिज हो गयी. चुनाव के चन्द महीनों के अंदर ही 21 सालों से सत्ता में काबिज नीतीश कुमार जैसे मजबूत नेता को संघ और भाजपा ने सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया. यह राजनीतिक परिघटना हमारे प्रदेश के लिये खतरनाक और चिंताजनक है.

भाजपा के नये नेतृत्व और मुखिया ने आते ही
1.उत्तर प्रदेश की तर्ज पर बुल्डोजर राज का आगाज कर दिया.
2.चुनावी वादे के अनुसार महिलाओं को 10 हजार रुपए के अतिरिक्त 1.90 लाख देने के बजाय चुनाव के दौरान दिये गये दस हजार रुपए भी वापस करने का दबाव बनाया जा रहा है.
3.मतदाता सूची से हटाये गये लोगों को सभी सरकारी योजनाओं से वंचित करने की घोषणा मुख्यमंत्री द्वारा की जा चुकी है. भविष्य में इनकी नागरिकता भी छीनी जा सकती है.

उपरोक्त परिस्थितियों में लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान, बिहार को एक सुव्यवस्थित रणनीति बना कर प्रतिरोध खड़ा करना और संघर्षरत होना पड़ेगा. अन्य प्रगतिशील एवं जागरूक समाज के साथ साझा समन्वय बनाकर कर जनजागरुकता अभियान चलाना और प्रतिरोध खड़ा करना हमारे आगामी वर्ष का संकल्प होना चाहिये.

सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये ;-

1. अल्पसंख्यकों के
बहिष्कार और उन्हें हासिये
पर धकेलने के खतरनाक और समाज विरोधी राजनीति का संगठित प्रतिरोध करना हमारा दायित्व होगा.
2. विकास के नाम पर
पर्यावरण के विनाश की नीति के खिलाफ जनप्रतिरोध खड़ा करना होगा.
3. जनविरोध का प्रभा
.युवाओं तक पहुंचे, इसके लिये रणनीति बनायी जायेगी.
4. वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा
देश में परिसीमन की जो नीति लागू करने की कोशिश हो रही हैं, वह खतरनाक है. इस नीति से देश में विभान का खतरा मंडरा रहा है. राज्य राष्ट्रीय स्तर पर इस नीति के विरोध में सशक्त प्रतिरोध संगठित किया जायेगा.
5. बिहार आन्दोलन के समय 1975 में “जनता सरकार” का कार्यक्रम चला था. उसका अध्ययन कर उसके अनुरुप कार्ययोजना बनाने का प्रयास किया जाय.
6. चुनाव आयोग द्वारा एस.आई.आर. के माध्यम से वास्तविक मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर काटकर सत्ताधारी दल को अवैध रूप से फायदा पहुंचाना हमारे लोकतंत्र को समाप्त कर रहा है. अत: हमारे लिये एस.आई.आर. का जमीनी स्तर पर विरोध करना प्राथमिक दायित्व है.
7. हम विधायकों और सांसदों के “मल्टिप्लेक्स पेंशन’ का विरोध करते हैं.
8. सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के निजीकरण और सस्ते दर पर उद्योगपतियों के हाथों में लुटा देना राष्ट्रीय अपराध है. हम इस नीति को बंद करने के लिये संघर्षरत रहेंगे.

कार्यक्रम के पारित प्रस्ताव.
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1. अपनी मांगों के पक्ष तथा एस.आई.आर. के खिलाफ अन्य सहमना संगठनों के साथ मिलकर सितम्बर माह में राज्य स्तरीय प्रदर्शन आयोजित किया जायेगा.
2. चिन्हित जिलों के विधान सभा क्षेत्रों के कुछ बूथों मतदाता सूचि का अध्ययन कर गलत ढंग से मतदाता सूचि से नाम कटे मतदाताओं की सूचि बनाकर उन्हें जागरूक एवं संगठित किया जाय और उन्हें संघर्ष के लिये तैयार किया जाय. राज्य कोर कमिटि इसकी रूप रेखा तैयार करेगी.


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