18 जून 80 साल पहले डॉ. राममनोहर लोहिया ने “अंग्रेजों भारत छोड़ो की” तर्ज पर पुर्तगालीयों “गोंवा छोड़ो” का नारा दिया था. इस मौके पर गोंवा के ही वरिष्ठ बहुभाषिक पत्रकार श्री. संदेश प्रभुदेसाई ने अंग्रेजी भाषा में 41 पन्नौकी एक पुस्तिका जिसमें 18 जून 1946 से 64 दिनो का क्रमवार संक्षिप्त रूप से The chronology of 64 Days. इस शिर्षक से पुस्तिका का लेखन किया है. जिसमें 18 जून 1946 की सुबह से ही मड़गांव शहर धीरे- धीरे युद्धभूमि मे तब्दील हो गया. पुर्तगाली पुलिस की गाड़ियां पूरे शहर में गस्त लगाते हूऐ घुम रही थी. शस्त्रधारी पुलिसवाले शहरके मौक़े वाली जगहोंपर चौकस खड़े थे. लेकिन इसके बावजूद भी मडगांव के उस जगह पर जिसे उस समय मुनसिपल चॅपल ग्राउंड बोला जाता था. उसिको आजकल डॉ. राममनोहर लोहिया पार्क के नाम से जाना जाता है.
लोग उस मैदान में इकठ्ठा होते जा रहे थे. और लगभग 5000 लोग इकठ्ठा हो गऐ थे. और आपसमे ही फुसफुसाते हूऐ 36 साल के नवयुवक राममनोहर जो उत्तर प्रदेश में पैदा हूए थे. और बंबई कलकता जैसे शहरों से पढने के बाद अगली पढ़ाई के लिए जर्मनी में गऐ थे. और उसी जगह पर गोंवा के डॉ. जुलियस मेनेझेस नांम के अपने ही उम्र के गोवेंनिज विद्यार्थि से दोस्ती हो गई थी. डॉ लोहिया 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भुमिगत गतिविधियों शामिल होने के बाद, जब अंग्रेजी पुलिस के द्वारा गिरफ्तार कर लिऐ गए थे. तब उन्हे और जयप्रकाश नारायण को लाहोर के किले की कालकोठरी मे बंद कर दिया था. और विवस्त्र करते हूऐ नंगे बदन में ही बर्फ की सिल्ली पर लिटाकर और कई दिनों तक एक क्षण की भी निंद नही, इसतरह की अंग्रेजों की पुलिस ने विभिन्न प्रकार की अमानविय सारी यंत्रणाऐ दी थी. इसलिए लोहिया जेल से रिहा होने के बाद उनके खराब स्वास्थ को देखकर ही स्वास्थ लाभ के लिए ही डाॅ. मेनेझेसने उन्हें गोंवा मे अपने घर पर विश्राम करने का आग्रपूर्वक निमंत्रण दिया था. और उस निमंत्रण की वजह से ही डाॅ. लोहिया 16 जून को गोंवा आए थे. और लोहिया के आने की खबर गोंवा मे फैल गई थी. इसलिए उन्हें मिलने के लिए शेकडो लोग सभी समुदायों से आए. और उन्होंने अपने साथ पुर्तगाली सरकारी कर्मचारी और पुलिस कैसे- कैसे जुल्म ढहाती है इस दौरान 1932 से 1968 तक लगभग 36 सालों तक पुर्तगाल मे एक अर्थशास्त्री और प्रोफेसर रहे एंटोनियो डी सालाजार का तानाशाही का राज था. (Antonio Oliveira Salazar) जिसके तानाशाही शासनकाल से लोहिया भलीभांति परिचित थे. इसलिए यह सब दास्ताँ सुनने के बाद लोहिया अपनी खुद की ताजा- ताजा अंग्रेजों की जेल की यंत्रणाऐ, और उस कारण बिगडा हुआ स्वास्थ्य की बगैर परवाह किए, तुरंत उन्हि लोगों को कहाँ की मड़गांव के खुले जगह पर एक जनसभा का आयोजन करो. कहने पर डॉ. मेनेझेस ने कहा कि पुर्तगाली पुलिस यह सभा नही होने देगी,
इसलिए लोहिया ने पहले ही आपना सभा मे देने वाले भाषण को लिखकर उसके हजारों पर्चा बना कर तैयार कर लिए थे. जो उस सभा में उपस्थित लोगों मे 18 जून 1946 की सुबह मे ही वितरित किए गए थे . इस कारण से वह भाषण गोंवा के अलावा भारतभर मे और विश्व के अन्य देशों में भी और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नया – नया ही बना हुआ यूएनओ तक भी पहुंच गया था. और 18 जून 1946 को ऐतिहासिक सभा में उपस्थित पुर्तगाली पुलिस कॅप्टन मिरांडा ने जब मंचपर खड़े लोहिया पर भाषण की शुरुआत करने के पहले ही अपने कमर पर टंगी हुई पिस्तौल को निकाल कर लोहिया पर तानते हूऐ, उन्हें भाषण नही करने का जैसा ही आदेश दिया. उसी क्षण लोहिया ने उस पुलिस अफसर का पिस्तौल ताने हूऐ हाथ को अपने हाथ से पकड़ कर पिस्तौल की नली निचे की तरफ करते हूऐ, उस अफसर को कहाँ कि “देखो अगर आप हिंसा करोगे तो सभा में उपस्थित हजारों की संख्या में लोग खड़े हैं. अगर वह बेकाबू हो गऐ तो आपकी यह पिस्तौल और आपके साथ के यह मुठ्ठीभर पुलिसवालों का क्या होगा? यह आप अच्छी तरह से समझिए,” और लोहिया की इस बात से वह पुलिसवाला भी नर्वस होते हूए, अपने तेवर बदल कर लोहिया को कहाँ कि” मै आपको गिरफ्तार कर रहा हूँ. और वह उस मंच से उन्हें और उनके साथ गोंवेनिज मित्र डॉ. मेनेझेस को शांतिपूर्ण तरीके से घोडागाड़ी में बैठाकर लेकर गया. और इस घटना से प्रभावित होकर 13 लोगों ने सभा को संबोधित किया. यह नजारा देखने के बाद पुलिस ने लाठीचार्ज किया. लेकिन इससे लोगों मे और भी जोश पैदा होकर मैदान के अगल-बगल की सभी दुकानदारों ने अपनी दुकानों को बंद करते हूऐ, श्याम तक पूरा सभास्थल के लोग 7000 की संख्या में मार्च करते हुए तुफान बारिश मे पुलिस स्टेशन पहुचकर उन्होंने गिरफ्तार किऐ गए लोगों को तुरंत गिरफ्तारी से मुक्त करने के लिए नारेबाजी शुरू की गिरफ्तार किए गए लोगो मे से एक 22 साल की वत्सला किर्तनी नामकी युवती भी थी. घबराहट मे पुलिस ने सबसे पहले उसे बगैर किसी शर्त के साथ रिहा कर दिया.
और रात काफी हो गई थी लेकिन लोग पुलिस स्टेशन से हटने के लिए तैयार नहीं देख-कर पुलिस ने लोहिया को लोगों को संबोधित करने का आग्रह किया. लोहिया ने लोगों को शांत होने का आवाहन किया. और अपने – अपने घरों में चले जाने का आग्रह करते हूऐ इसके आगे भी मानवाधिकार का आंदोलन जारी रखने का आवाहन किया. तो लोग देर रात तक पूरे गोंवा भर मे जुलुस- जलसे करते हूऐ भाषणों का सिलसिला काफी देर रात तक चलने का नजारा जो गोंवा मे 450 सालों के पुर्तगालीयों के शासन में शायद ही कभी 18 जून 1946 के दिन की सुबह से शुरू हुआ सिलसिला 18 अगस्त तक कुलमिलाकर 64 दिनो तक, कैसे – कैसे चला था. इसका संक्षिप्त विवरण प्रभुदेसाई ने अपने इन 41 पन्नौकी किताब में देने की कोशिश की है. इसे देख कर लेखक संदेश प्रभुदेसाई को मेरा विनम्र अनुरोध है कि उन्होंने गोंवा के स्वतंत्रता संग्राम की विस्तृत जानकारी देते हुए एक बडी किताब लिखनी चाहिए. मै भी आपके इस पुस्तिका को देखने के बाद मुझे खुद को भी लग रहा है कि यह आपके किसी बडी किताब का संक्षिप्त परिचय के रूप में लिखि हुई शुरुआत है. जिससे गोंवा तथा देश और दुनिया की नई पिढि के लोगों को पता चलेगा कि जो मडगांव के खुले मैदान से शुरू हुआ गोंवा के स्वतंत्रता संग्राम मे नई चेतना पैदा करने का ऐतिहासिक सुत्रपात डॉ. राममनोहर लोहिया की क्रांतिकारी प्रेरणा से शुरू होने के बाद गोंवा के लोगों मे इस घटना से सालाजार के फासिज्म राज के प्रतिनिधि जो गोंवा मे भी जबरन 450 सालों से लगातार जमे हुए थे और इस अंतिम पड़ाव में 1932 से मुल पुर्तगाल की भी सत्तापर एक तानाशाही सरकार आने की वजह से भारत के अंग्रेजी शासन की तुलना में गोंवा मे पुर्तगालीयों का शासन जादा क्रूरता वाला था.
इसलिए गोंवा के लोगों मे 450 सालों से लगातार लोगों के भितर पुर्तगालीयों मे जो भय की बर्फ जम गई थी उसे पिघलने के लिए डॉ राममनोहर लोहिया के 18 जून 1946 के भाषण से भयमुक्त होकर, गोंवा के लोगों का 450 सालों की पुर्तगालीयों की अत्याचारी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए, गोंवा के लोगो मे लोहिया की इस पहल से नई ऊर्जा का संचार करने का काम, गोंवा के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दर्ज होने के साथ- साथ, गोंवा के स्वतंत्रता संग्राम को गतिप्रदान करने का ऐतिहासिक दिन के रुप में गोंवा के लोग आज भी याद करते हैं. इसलिए हमारे मित्र संदेश प्रभुदेसाई ने बहुत ही बढ़िया ढंग से एक – एक दिन के 64 रोमांचक प्रसंगो को पूरी तरह से अकादमिक अनुशासन से इस 41 पन्नौकी किताब में समेटने का अविस्मरणीय काम किया है . जिसमें उन्होंने 19 चैप्टरो मे 64 दिनो का एक डायरी के जैसे, संक्षेप में एक- एक दिन की घटनाओं पर रोशनी डालने का बहुत ही मेहनत से ऐतिहासिक कागज पत्रों की जांच करते हुए, यह काम किया है.पहले चॅप्टरके बाद दुसरे चॅप्टरमे एकसे बढकर एक प्रसंग का समालोचन किया है.
19 जून 1946 के दिन डॉ. राममनोहर लोहिया का भाषण भले ही मडगांव की सभा में पुलिस ने उन्हें नहीं देने दिया था. उसके लिए लोहिया ने किए हूऐ प्रतिकार पहले से ही लिखित रूप में होने की वजह से संपूर्ण भारत के मिडिया मे प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था. इसितरसे लेखक ने 18 अगस्त 1946 के 64 दिनो का एकेक दिन को गोंवा मे तथा देश और दुनिया में 18 जून से 18 अगस्त तक के 64 दिनो की गोंवा की आजादी के लिए क्या क्या हुआ है इसमे गोंवा तथा देश भर के लोगों का गोंवा की आजादी कि लडाई मे शामिल होने का सुत्रपात होने का विवरण देने के लिए लेखक ने 38 अंग्रेजी तथा 24 मराठी 6 कोंकणी और एक हिंदी भाषा की मिलाकर 69 किताबोंतथा दस्तावेजों की सूची( Bibliography) अंतमे दी है.
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