बाबा नागार्जुन : कविता में नए लोकतंत्र की तलाश — जगदीश्वर चतुर्वेदी

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Baba Nagarjun

हिन्दी में बाबा नागार्जुन को पूज्य बनाने और शब्दों की जुगाली करके ठिकाने लगाने की मित्र-क्रियाएँ आरंभ हो गई हैं। बाबा पर इन दिनों जितनी चर्चाएँ हो रही हैं, उनमें बुर्जुआ लोकतंत्र और प्रतिवादी लोकतंत्र के बीच के अंतर पर बातें कम हो रही हैं। बाबा की कविता में बुर्जुआ लोकतंत्र की गंभीर आलोचना व्यक्त हुई है। बाबा पर बातें करते समय आमतौर पर अवधारणाओं को अमूर्त बनाकर देखने और चित्रित करने का रिवाज रहा है।

मसलन, नागार्जुन की कविता की रोशनी में हिन्दी समीक्षक उन्हें लोकतंत्र-विरोधी के रूप में चित्रित करते रहे हैं और समाजवादी भी बताते रहे हैं। उनकी कविता की खूबी है कि वह राजनीतिक और लोकतांत्रिक है। यह बुर्जुआ लोकतंत्र की समीक्षा की कविता है। यह ऐसी कविता है, जो बुर्जुआ लोकतंत्र के दमनात्मक रूप का उद्घाटन करती है। उसके रेशनल को ध्वस्त करती है। इस कविता ने परंपरागत कविता के फॉर्म को तोड़ा है। उसकी जगह कविता के लोकतांत्रिक ढाँचे का निर्माण किया है। अभी हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं, उसमें हेज़ेमनी है और व्यक्ति द्वारा व्यक्ति का शोषण चरम पर है। इस वातावरण में रूपकथाओं, रूपकों, मिथकों और राजनीतिक मुहावरों में सोचने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। जीवन की कठोर वास्तविकताओं की बजाय सॉफ्ट यथार्थ और निर्मित यथार्थ केंद्र में आ गए हैं। हिन्दी में इन दोनों प्रकार के यथार्थ पर खूब लिखा जा रहा है। इसका महिमामंडन भी हो रहा है। इस क्रम में ठोस यथार्थ क्या होता है और उसके प्रमुख सवाल क्या हैं, उन पर बातें बंद हैं। बाबा के बहाने हम सोचें कि कविता के सामने आज क्या संकट है या चुनौतियाँ हैं।

कविता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है सामयिक यथार्थ के मर्म को पकड़ने की। पहले एक नई स्थिति पर ध्यान दें। एक ज़माना था, जब साहित्य में दुनिया के सवाल उठाए जाते थे, लेकिन नए दौर में साहित्य के बारे में ही, कविता के बारे में ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं। साहित्य और कविता की प्रासंगिकता पर ही प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं।

एक ज़माना था, जब कविता में कल्पना का बोलबाला था। लेकिन बाबा ने कल्पना को गौण और सच को प्रधान बनाया, और यह काम बड़े ही कौशल के साथ किया। वे कविता की अधिरचना को सतही यथार्थ के ज़रिए आरंभ करते हैं और फिर उसके वास्तविक मर्म के भीतर चले जाते हैं। यहाँ उनका यथार्थ के प्रति आग्रह प्रबल हो उठता है। इस प्रसंग में उनकी कविता ‘कौन हाँफ रहा है’ (1990) को देखा जा सकता है। यह समाजवाद के पतन पर लिखी गई एक शानदार कविता है। उन्होंने लिखा है—

‘‘कौन हाँफ रहा है?
किसका दम घुट रहा है?
अरे, अरे, मैं पहचानता हूँ,
दूर से ही सही।
मैंने बार-बार
उसके पैरों की आहट सुनी है।
जी, मैं पहचानता हूँ।
वो सोशलिज्म है।
वो कम्युनिज्म की तरफ
तेजी से बढ़ा जा रहा था।
हाय, बीच रास्ते में ही
इसका दम क्यों फूलने लगा?
क्या वे कोलखोज यक-ब-यक
ऊसर हो गए?
सामूहिक कृषि-फार्म के
गेहूँ तो हम तक भी पहुँचे थे,
दूर ग्रामांचल में, ‘तरौनी’ गाँव तक।
सोवखोज वाली सुनहली फसलों की खुशबू
मेरे ग्रामांचल की आबोहवा में भी
जाने कितनी बार फैली है…
यह सब कुछ तुम्हें बतलाएँगे
कामरेड चतुरानन झा!!
साथी श्यामलकिशोर,
आप बतलाओ,
वे कोलखोज क्या अब
बालू ही बालू रह गए?
क्या सचमुच रूस के लोग भूखे-प्यासे
दिन-प्रतिदिन गुज़ारते हैं अब?
‘पेरेस्त्रोइका’ का क्या हुआ?
‘ग्लासनोस्त’ के शंखनाद का क्या हुआ?
कामरेड गोर्बाचोव, सच-सच बतलाओ—
सोवियत भूमि में इन दिनों
क्या कुछ कर रहे हैं लोग?’’

इस कविता में फिक्शन और गैर-फिक्शन, दोनों घुले-मिले हैं। कल्पना और सच, दोनों घुलमिल गए हैं। विचारधारा और कविता, दोनों एक-दूसरे में समाहित हो गए हैं। यह कविता एक तरह से गैर-काल्पनिक फॉर्म का उदाहरण है। यह केवल कविता नहीं, बल्कि एक तरह का लेखन है; पत्रकारिता है। यह कविता को लेखन में तब्दील करने का प्रयास है।

बाबा की कविता में एक और महत्त्वपूर्ण प्रयास नज़र आता है—राजनीतिक कविता की साख बनाना। वे हिन्दी में कलावादियों द्वारा निर्मित अराजनीतिक कविता के वातावरण को तोड़ते हैं और राजनीतिक कविता की प्रतिष्ठा स्थापित करते हैं। निश्चित रूप से इसमें प्रगतिशील काव्यधारा की भी बड़ी भूमिका रही है, लेकिन बाबा की भूमिका अन्यतम है। राजनीतिक कविता में सामाजिक सच्चाई को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया जा सकता है—इस बात की स्वीकृति बाबा ने ही कराई। वैविध्यपूर्ण राजनीतिक कविता लिखकर वे कविता को जहाँ विचारधारा के दायरे के परे ले गए, वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र की प्रचलित अवधारणाओं के भी परे ले गए। राजनीतिक कविता को साहित्यिक स्वीकृति दिलाकर बाबा ने शीतयुद्ध का उत्तर दिया। वे किसी भी तरह शीतयुद्ध के इस या उस खेमे से बँधते नहीं हैं। वे जिस समय राजनीतिक कविता की साख बना रहे थे, उसी समय हिन्दी की भी साख बना रहे थे। हिन्दी भाषा को प्रतिवाद की भाषा बना रहे थे। वे कविता में नए-नए राजनीतिक विमर्शों की रचना कर रहे थे। कविता में विमर्श के वे सबसे बड़े कवि हैं। जो लोग इन दिनों साहित्य में विमर्श को देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, उनके लिए बाबा सटीक उत्तर हैं। वे कविता में विमर्श के कवि हैं। जिस तरह शमशेर कवियों के कवि हैं, उसी तरह बाबा विमर्शों के कवि हैं। जो लोग यह कहते हैं कि विमर्श की संस्कृति उत्तर-आधुनिक, आयातित और परायी संस्कृति है, उन्हें बाबा की कविता को देखना चाहिए। वे बड़े पैमाने पर विमर्शों को कविता में ले आते हैं।

बाबा हिन्दी में पैराडाइम शिफ्ट के कवि हैं। पैराडाइम शिफ्ट का कवि वह होता है, जो अपनी कविता के ज़रिए एक अन्य संस्कृति की ओर ले जाए। बाबा ने अपनी राजनीतिक कविताओं, खासकर हिन्दी, बांग्ला और मैथिली कविताओं के माध्यम से ऐसी संभावनाएँ पैदा की हैं। उनकी कविता एक ही साथ कई संस्कृतियों में विचरण करती है। वे कविता को, विशेषकर प्रगतिशील कविता को, एक नए पैराडाइम में ले जाते हैं। वे उन चंद कवियों में हैं, जो हिन्दी कविता को दैनंदिन राजनीति के करीब ले जाते हैं। दैनंदिन राजनीति के पास कविता के जाने का असर यह हुआ कि कालांतर में हिन्दी कवियों ने दैनंदिन जीवन पर केंद्रित होकर कविताएँ लिखीं। दैनंदिन जीवन कविता के केंद्र में आया। दैनंदिन राजनीतिक कविताएँ सामयिक आंदोलनों के प्रत्युत्तर और उनकी ज़रूरतों के लिहाज़ से लिखी गई थीं। बाद में इन कविताओं को साहित्य की राजनीतिक प्रतिक्रिया भी मान लिया गया।

प्रगतिशील कविता का साम्यवादी आंदोलन के बाहर भी भविष्य है—इस ओर भी बाबा ने ध्यान खींचा है। वे कविता में पहली बार व्यापक रूप में मानवाधिकारों के सवालों को लेकर आते हैं। बाबा से पहले मानवाधिकारों को कविता के केंद्र में किसी ने नहीं लाया। कविता को मजदूर-किसान के स्टीरियोटाइप से निकालकर मानवाधिकारों के बृहत्तर कैनवास पर लाकर बाबा ने पैराडाइम शिफ्ट का काम किया है। बाबा की 1970–71 से मानवाधिकारों पर केंद्रित कविताएँ आनी शुरू होती हैं और यह सिलसिला थमता नहीं है। वे अब कविता में उन विषयों की ओर मुड़ते हैं, जो मानवाधिकारों से संबंधित हैं। इस प्रसंग में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में हुई बूथ कैप्चरिंग और अर्द्ध-फासीवादी आतंक पर लिखी उनकी कविताओं को प्रस्थान-बिंदु के रूप में देखा जाना चाहिए। ये कविताएँ बाबा को प्रगतिशील कवि की प्रचलित कोटि के बाहर ले जाती हैं और वे हठात् मानवाधिकारों के रक्षक कवि के रूप में सामने आते हैं। वे दल और विचारधारा की सीमाओं का भी इसी आधार पर अतिक्रमण करते हैं और इसी आधार पर लोकतंत्र के खोखलेपन की आलोचना भी करते हैं।

हमें 1970–71 के बाद की बाबा की कविताओं को मानवाधिकार-साहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। वे पहली बार प्रगतिशील कविता की सहमति को तोड़ते हैं। प्रगतिशील कवियों के बीच अनेक ऐसे प्रश्न हैं, जिन पर आम सहमति नहीं है; इनमें बाबा की कविताएँ सबसे अधिक उल्लेखनीय हैं, क्योंकि वे इस आम सहमति को तोड़ती हैं। चाहे चीन-भारत युद्ध का प्रश्न हो, नक्सलवाद के चित्रण का प्रश्न हो, संपूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रश्न हों या आपातकाल के प्रश्न—आपातकाल के बाद तो यह सिलसिला और भी तेज़ी से आगे बढ़ता है। मानवाधिकार के पैराडाइम में आने के साथ ही प्रगतिशील कविता में बनी आम सहमति टूट जाती है। प्रगतिशील कविता के पैराडाइम में अधिकांश कवि साम्यवादी विचारधारा से बँधे थे, लेकिन बाबा ने जब मानवाधिकारों की दुनिया में शिफ्ट किया, तो पूरा परिदृश्य बदल गया। वे साम्यवादी विचारधारा के दायरे से बाहर निकल गए। यह शिफ्ट भारत-चीन युद्ध के समय से आरंभ हुआ था, लेकिन इसका ठोस आधार पश्चिम बंगाल में 1972–77 के अर्द्ध-फासीवादी आतंक के दौर में बना। उसके बाद बाबा ने कविता में मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य को कभी नहीं छोड़ा। इसी अर्थ में बाबा को पैराडाइम शिफ्ट का बड़ा कवि कहा जा सकता है। मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, त्रिलोचन, शीलजी आदि की एक ही सीमा है कि वे पैराडाइम शिफ्ट के कवि नहीं हैं। यही स्थिति बाद के कवियों—रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, केदारनाथ सिंह आदि—की भी है। ये सभी एक ही पैराडाइम में बँधे हुए हैं।


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