बिटिया : अपने आकाश की उड़ान

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Daughter: Soaring in Her Own Sky

Parichay Das

— परिचय दास —

बिटिया का होना घर में एक फूल का खिलना भर नहीं है। फूल तो डालियों पर भी खिलते हैं, लेकिन बिटिया घर के भीतर एक ऐसी ऋतु लेकर आती है, जिसका रंग दीवारों से लेकर मन के सबसे एकांत कोनों तक फैल जाता है। उसके आने से घर केवल घर नहीं रहता, उसमें एक नई भाषा जन्म लेती है। एक ऐसी भाषा, जिसमें हँसी के छोटे-छोटे उच्चारण होते हैं, रूठने की अपनी व्याकरण होती है और मनुहार के इतने अर्थ कि शब्दकोश भी उन्हें पूरा नहीं समझा सकता।

बिटिया दिवस पर सोचता हूँ कि बिटिया आखिर होती क्या है? क्या वह पिता की आँखों में उतर आया कोई स्वप्न है? माँ की गोद में मुस्कराता हुआ कोई उजाला? घर के आँगन में दौड़ती हुई एक नन्ही हवा? या वह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर जीवन अपने पूरे विस्तार में खोजता रहता है?

बिटिया इन सबसे कुछ अधिक है। वह अपने आप में एक संपूर्ण मनुष्य है, जिसकी अपनी इच्छाएँ हैं, अपने स्वप्न हैं, अपनी उड़ान है। वह किसी की प्रसन्नता का कारण होने से पहले स्वयं अपनी प्रसन्नता की अधिकारी है। उसके होने का अर्थ केवल किसी घर को सुंदर बनाना नहीं, बल्कि संसार को अपनी उपस्थिति से अधिक मानवीय बनाना भी है।

जब वह छोटी होती है, तब घर की वस्तुओं से उसका एक विचित्र संबंध बनता है। गुड़िया उसकी सहेली होती है, खिलौने उसके संसार के नागरिक। कभी वह गुड़िया को सुलाती है, कभी उसे डाँटती है, कभी उसके लिए खाना बनाती है। उस छोटे-से खेल में जीवन की कितनी बड़ी तैयारियाँ छिपी होती हैं! वह अभी स्वयं ठीक से बोलना नहीं जानती, लेकिन अपनी गुड़िया से इतनी बातें करती है कि लगता है, संसार की सारी चुप्पियाँ उसी के पास आकर खुल जाती हैं।

उसकी हँसी घर की घड़ी को कुछ देर के लिए रोक देती है। उसकी आवाज़ में ऐसा क्या होता है कि दिनभर की थकान लौटकर दरवाजे पर ही ठहर जाती है? पिता के हाथ में कोई जरूरी कागज हो, कोई गंभीर पुस्तक खुली हो, कोई विचार अपने सबसे कठिन मोड़ पर हो, बिटिया की एक पुकार उन सबके बीच अपना रास्ता बना लेती है। वह जानती भी नहीं कि उसने किस बड़े आदमी को उसके भीतर छिपे छोटे बच्चे तक पहुँचा दिया है।

बिटिया के साथ पिता भी धीरे-धीरे बड़ा होता है। वह सीखता है कि शक्ति का अर्थ केवल निर्णय लेना नहीं, किसी की बात ध्यान से सुनना भी है। प्रेम का अर्थ केवल सुरक्षा देना नहीं, किसी को अपने निर्णय स्वयं लेने का साहस देना भी है। पिता की उँगली पकड़कर चलने वाली बिटिया एक दिन उसी पिता को जीवन के उन रास्तों पर चलना सिखाती है, जहाँ अधिकार से अधिक विश्वास की आवश्यकता होती है।

बिटिया का बचपन देखते हुए कभी-कभी लगता है कि समय बहुत निर्दयी है। वह अपने आने की कोई सूचना नहीं देता, न जाने की कोई अनुमति माँगता है। कल तक जो बच्ची आँगन में छोटी-छोटी चप्पलें घसीटती फिरती थी, आज उसके कदम घर की चौखट से आगे बढ़ने लगे हैं। कल तक जिसकी चोट पर माँ की आँखें भर आती थीं, आज वही अपनी पीड़ा छिपाकर दूसरों को सांत्वना देती है।

बचपन की तस्वीरें घर में रह जाती हैं। दीवार पर टँगी कोई पुरानी तस्वीर, अलमारी में रखा कोई छोटा-सा खिलौना, पुस्तक के बीच दबा हुआ कोई सूखा फूल, कभी-कभी जीवन के सबसे बड़े दस्तावेज बन जाते हैं। उन्हें देखकर लगता है कि समय बीतता नहीं, वह हमारे भीतर अपना घर बना लेता है।

बिटिया दिवस हमें केवल बिटिया के प्रति प्रेम व्यक्त करने का अवसर नहीं देता, वह हमें अपने समाज की स्मृति में झाँकने के लिए भी बुलाता है। कितनी लंबी यात्रा रही है एक बेटी की! कभी उसके जन्म पर घरों में उदासी उतर आती थी। कभी उसके हिस्से का भोजन, शिक्षा और अवसर किसी दूसरे के नाम लिख दिए जाते थे। कभी उसके सपनों को परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर छोटा कर दिया जाता था। कभी उसकी चुप्पी को संस्कार और उसकी असहमति को अवज्ञा समझ लिया जाता था।

समय बदला है, बहुत कुछ बदला है। बेटियाँ विद्यालयों से विश्वविद्यालयों तक पहुँची हैं। वे विज्ञान, साहित्य, प्रशासन, कला, खेल और जीवन के अनेक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रही हैं। वे अपने श्रम, प्रतिभा और विवेक से संसार को नया आकार दे रही हैं। लेकिन परिवर्तन की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। अवसरों के दरवाजे खुले हैं, फिर भी अनेक चौखटों पर पुरानी आशंकाएँ बैठी हुई हैं। स्वतंत्रता की बातें होती हैं, पर निर्णय लेने की घड़ी में कई बार बेटी की इच्छा सबसे अंत में पूछी जाती है।

इसलिए बिटिया दिवस का अर्थ केवल उत्सव नहीं, आत्मपरीक्षण भी है। हमें देखना होगा कि हम अपनी बेटियों को किस प्रकार का संसार सौंप रहे हैं। क्या हम उन्हें केवल सफल होने की शिक्षा दे रहे हैं, या असफल होने का साहस भी? क्या हम उन्हें केवल दूसरों का सम्मान करना सिखा रहे हैं, या अपने सम्मान की रक्षा करना भी? क्या हम उनसे केवल परिवार की मर्यादा निभाने की अपेक्षा करते हैं, या परिवार को अधिक न्यायपूर्ण और संवेदनशील बनाने में उनकी भूमिका भी स्वीकार करते हैं?

बेटी को बचाना आवश्यक है, लेकिन उसे भय के भीतर बचाकर रखना पर्याप्त नहीं। उसे पढ़ाना आवश्यक है, लेकिन केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए नहीं। उसे संस्कार देना आवश्यक है, लेकिन ऐसे संस्कार नहीं, जो उसकी स्वतंत्र चेतना को ही बाँध दें। उसे प्रेम देना आवश्यक है, लेकिन ऐसा प्रेम भी नहीं, जो हर कदम पर उसकी स्वतंत्रता का हिसाब माँगे।

प्रेम की सबसे सुंदर पहचान यह है कि वह अपने प्रिय को अपने जैसा बनाने की जिद नहीं करता। वह उसे अपने होने की पूरी जगह देता है। बिटिया के लिए भी यही सबसे बड़ा उपहार है कि वह अपने पिता की अधूरी इच्छाओं का बोझ न बने, माँ के त्याग की प्रतिकृति न बने, परिवार की प्रतिष्ठा का प्रदर्शन न बने। वह अपने जीवन की रचनाकार बने।

बिटिया जब बड़ी होती है, तब उसके भीतर एक नया आकाश खुलता है। वह प्रश्न करती है। कभी पिता की किसी बात से असहमत होती है, कभी माँ की किसी धारणा को चुनौती देती है। कभी अपनी पसंद के कपड़े चुनती है, कभी अपनी राह। उसके प्रश्नों से घबराना नहीं चाहिए। प्रश्न करना उसके व्यक्तित्व का विकास है। वह यदि अपने घर में प्रश्न नहीं कर सकेगी, तो बाहर की दुनिया में अपने अधिकारों के लिए कैसे खड़ी होगी?

एक बेटी का आत्मविश्वास केवल उसके अपने प्रयासों से नहीं बनता। उसके आसपास के लोगों का व्यवहार भी उसमें अपना हिस्सा जोड़ता है। जब घर में उसकी बात सुनी जाती है, जब उसकी उपलब्धियों को उसके भाई की उपलब्धियों से कम नहीं आँका जाता, जब उसके निर्णयों पर विश्वास किया जाता है, तब उसके भीतर एक ऐसी शक्ति विकसित होती है, जो किसी प्रमाणपत्र से नहीं मिल सकती।

और यह भी कि बिटिया को प्रेम करने के लिए किसी विशेष दिवस की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। फिर भी दिवसों का अपना महत्त्व है। वे हमारी भागती हुई दिनचर्या में एक क्षण रोकते हैं। हमें याद दिलाते हैं कि जिन लोगों को हम अपने जीवन का सबसे निकटतम हिस्सा मानते हैं, कई बार उन्हीं के लिए समय निकालना भूल जाते हैं। बिटिया दिवस इसी विस्मृति के विरुद्ध एक छोटी-सी दस्तक है।

बिटिया के लिए कोई बहुत बड़ा उपहार आवश्यक नहीं। कभी उसके साथ बैठकर उसकी बात सुन लेना, कभी उसके किसी साधारण-से स्वप्न को गंभीरता से ले लेना, कभी उसकी असफलता के समय उसे यह विश्वास दिलाना कि जीवन किसी एक परिणाम का नाम नहीं है, कभी उसकी सफलता पर उससे भी अधिक प्रसन्न हो जाना, ये सब ऐसे उपहार हैं, जिनकी चमक समय के साथ कम नहीं होती।

और यदि बिटिया दूर रहती है, किसी दूसरे शहर में, किसी दूसरे देश में, अपने काम और अपने संसार में व्यस्त है, तब भी वह घर से दूर कहाँ होती है? माँ के फोन पर उसकी आवाज़ सुनाई देती है तो रसोई में रखी चाय कुछ अधिक मीठी लगने लगती है। पिता मोबाइल की स्क्रीन पर उसकी तस्वीर देखते हैं तो जाने कितनी पुरानी स्मृतियाँ एक साथ जाग उठती हैं। दूरी भूगोल में होती है, प्रेम में नहीं।

बेटी का घर कौन-सा है? जहाँ वह जन्मी? जहाँ उसने बचपन बिताया? जहाँ वह अपने स्वप्नों के साथ रहती है? या वह घर, जहाँ लौटने पर उसे किसी भूमिका का अभिनय नहीं करना पड़ता? शायद उसका घर वही है, जहाँ उसे केवल बेटी होने के कारण नहीं, अपने पूरे मनुष्य होने के कारण स्वीकार किया जाता है।

बिटिया दिवस पर हमें अपनी बेटियों से यह नहीं कहना चाहिए कि तुम हमारे लिए बहुत कुछ हो, इसलिए तुम्हें हमारे लिए बहुत कुछ करना है। हमें कहना चाहिए कि तुम अपने लिए बहुत कुछ हो। तुम्हारा जीवन तुम्हारा है। तुम्हारी हँसी तुम्हारी है। तुम्हारे सपने तुम्हारे हैं। हम तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारे स्थान पर नहीं।

क्योंकि बिटिया कोई ऐसी कविता नहीं, जिसे पिता अपनी पसंद के अनुसार पूरा कर दे। वह स्वयं अपनी कविता है। उसमें कुछ पंक्तियाँ घर से आती हैं, कुछ समाज से, कुछ अनुभव से और कुछ उन अनकहे स्वप्नों से, जिन्हें वह अभी स्वयं भी पूरी तरह नहीं जानती। उसके जीवन का सौंदर्य इसी में है कि वह अपनी पंक्तियाँ स्वयं लिखे।

आज जब बिटिया दिवस है, तब मन करता है कि हर घर की खिड़की थोड़ी और खुल जाए। हर पिता अपनी बेटी की आँखों में केवल भविष्य की चिंता नहीं, वर्तमान की चमक भी देखे। हर माँ अपनी बेटी में अपना विस्तार ही नहीं, एक स्वतंत्र व्यक्तित्व भी पहचाने। हर भाई अपनी बहन को संरक्षण देने के साथ-साथ उसके निर्णयों का सम्मान करना सीखे। और समाज बेटियों को अवसर देने को कोई उदारता न समझे, बल्कि इसे न्याय का सामान्य व्यवहार माने।

बिटिया के जन्म पर घर में जो पहला उजाला आता है, वह किसी एक दिन का उजाला नहीं होता। वह वर्षों तक घर की स्मृतियों में बना रहता है। वह पिता की थकी हुई आँखों में चमकता है, माँ की प्रार्थनाओं में बसता है, भाई की शरारतों में हँसता है और घर की पुरानी दीवारों पर समय के साथ एक अदृश्य रंग छोड़ जाता है।

बिटिया दिवस उसी रंग को पहचानने का दिन है। उस उजाले को केवल स्मरण करने का नहीं, उसके लिए संसार में पर्याप्त जगह बनाने का दिन है।

बिटिया घर की रौनक है, यह कहना सुंदर है। लेकिन उससे भी अधिक सुंदर यह स्वीकार करना है कि वह अपने आप में एक पूरा संसार है। उसे किसी की रौनक बनकर ही नहीं, अपनी रोशनी बनकर जीने का अधिकार है।

बिटिया दिवस पर हर बिटिया के लिए यही कामना है कि उसके हिस्से का आकाश खुला रहे, उसकी आवाज़ में विश्वास बना रहे, उसके सपनों के रास्ते पर भय की दीवारें कम हों और उसके जीवन में प्रेम ऐसा हो, जो उसे बाँधे नहीं, बल्कि उड़ने का साहस दे।

क्योंकि बिटिया जब उड़ती है, तब केवल एक घर का आँगन बड़ा नहीं होता, संसार का आकाश भी कुछ और विस्तृत हो जाता है।


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