श्रीविलास सिंह की चार कविताऍं

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पेंटिंग : कौशलेश पांडेय

1. सड़कें कहीं नहीं जातीं

सड़कें कहीं नहीं जातीं
वे बस करती हैं
दूरियों के बीच
सेतु का काम,
दो बिंदुओं को जोड़ती
रेखाओं की तरह,
फिर भी
वे पहुँचा देती हैं
हमारे सुख दुख
हमारी चिंताएँ,
प्रेम और घृणा,
रोजगार और दिहाड़ी
गाँव से शहर तक
और एक शहर से
दूसरे शहर तक।

वे होती हैं जर्जर भी
हमारी इच्छाओं, आकांक्षाओं का
बोझ ढोते ढोते
पर उफ तक नहीं करतीं।
सड़कों के सीनों में
दफन हैं किस्से
दुनिया जीत लेने के
स्खलित अभियानों से लेकर
रक्त और लाशों से पटे
भीषण पालयनों तक के
जब भाग रहे थे आदमी
आदमी से डर कर।

मैंने सुना है
रोती हैं सड़कें रात को
जब थम जाता है
दिन भर की
भागदौड़ का कोलाहल,
और सुबह
भीगी हुई मिलती है
किनारे की घास।
आखिर गुजरे भी तो हैं
लुटेरों के
सारे कारवाँ
इन्हीं सड़कों की
छातियों को रौंदते हुए,
और पहुँची हैं तमाम शवयात्राएँ
स्वजनों की
मरघट तक
इन्हीं सड़कों के कंधों पर।

2. धूप की नदी

मैं कब से बैठा हूँ
ॲंधेरे के इस पहाड़ की
तलहटी में,
अभी अभी गुजरे हैं इधर से
कुछ उद्दंड अश्वारोही
अपनी तलवारों पर हाथ फेरते
बेहद फूहड़ और भयानक हॅंसी के साथ।
मगर इस बात को तो
सदियाँ हो गयीं।

धुएँ के कई बादल
मरने वालों की चीखों पर सवार
इसी ॲंधेरे के पहाड़ में दफन हैं।
मैं अपनी प्यास की कुदाल से
खोद रहा हूँ
बरसों से अपनी इच्छाओं की रेत
फूट पड़े हैं मेरे चारों ओर
आग बरसाती धूप के सोते।
कई पैगम्बर यहीं मेरे पास ही
बैठ कर सुस्ताने के बाद
चले गए किसी अनजानी दिशा को

अपने कंधों पर अपनी सलीबें उठाये।
इसी तलहटी से
उठते रहे हैं कई इंकलाब
और रक्त की नदी पार करने के बाद
गुम हो गए हैं ध्वंस के बॉंझ रेगिस्तानों में,
उनके पीछे उग आए हैं
कुछ नए तानाशाह
कैक्टस की तरह।

इसी घाटी में रोशनी की किताबें
जल रही हैं धू-धू कर
और उनके जहरीले धुॅंए के नशे में मस्त
मेरी तमाम पीढ़ियाँ
जप रही हैं मंत्र
एक अनबूझी भाषा का
किसी गूॅंगे बहरे अदृश्य की
प्रार्थना में।
इसी पहाड़ के सामने वाले दलदल में
डूब कर मर गए हैं
बायीं और दायीं ओर से आने वाले
सत्य के तमाम अन्वेषक
जिन्होंने दावा किया था
सूरज का एक टुकड़ा तोड़ लाने का।
सब तरफ एक मरघट
उग आया है

सारे पैगम्बरों और
सत्य के अन्वेषकों को फूॅंकने के बाद,
सारी पवित्र किताबें सड़ चुकी हैं
रक्त में डूब कर,
सूरज कब का
उजाले को सॅंभाले-सॅंभाले अपने कंधों पर
धूप की नदी-सा बहने लगा है,
ॲंधेरे की तलहटी में
अभी भी गूॅंज रही हैं
आदमख़ोर अश्वारोहियों के
आने की आहट।

पेंटिंग : कौशलेश पांडेय

3. जब वे आएंगे

वे जब आएँगे
झुंड में होंगे
अतीत की महानता का
कीर्तन करते,
वर्तमान को नकारते
और भविष्य के प्रकाश से डरे,
ॲंधेरों की परिभाषाऍं बदलते।
इतिहास, संस्कृति और ज्ञान के
आलोक से वंचित
पर दिन रात करते
इन्हीं शब्दों का जाप।

उनके अफवाह के कारखाने
दिन रात गढ़ेंगे
नयी संस्कृति,
नए नायक, नए मिथ और
नया इतिहास भी।
उनके हाथों में होंगे
धर्म और जाति की
श्रेष्ठता के हथियार
घृणा के मंत्रों से अभिमंत्रित।

तुम जब तक जागोगे
अविश्वास से ऑंखे मलते,
तुम्हारे प्रेम और भ्रातृत्व के
सारे तर्क कुंद हो चुके होंगे
और सारे शस्त्र भोथरे।

तुम अपनी श्रेष्ठता की
ग्रंथि से पीड़ित,
अपने भद्रलोक में
बस रह जाओगे
अपने घाव सहलाते,
जब वे तुम्हारी दहलीज पर
दस्तक दे रहे होंगे,
तुम्हारे आरामगाहों की
प्राचीरों को ध्वस्त करने के पश्चात।

4. बुद्ध

देखा तुमने
हम डूबे हुए थे
दुख के सागर में
हमारी पीड़ा से द्रवित हुए तुम
सुझाया मार्ग तुमने
दुखों के बंधन से मुक्ति का,
जब बुझ जाती है यह ज्वाला
जीवन और मृत्यु की
‘निर्वाण’,
हिंसा में दग्ध विश्व को भर दिया
अहिंसा की शीतलता से,
मार्ग के ॲंधेरों को कर सके पराजित हम
बन कर अपना दीपक स्वयं
तुमने दिया आशीष,
हे महामानव
हमने तुम्हारी शिक्षाओं को
कर दिया पुस्तकों की कारा में कैद,
बना दिया तुम्हें ईश्वर
ढाल कर पत्थर के शरीर में,
और तुम्हारी पूजा के पश्चात
बहाते रहे नदियॉं रक्त की निर्बाध,
हिंसा के शोर में फिर डूब गयी है
सारी मानवता
और हम आत्मदीपक की बजाय
बदल गए बारूद के ढेर में,
पिता तुम आज एक बार फिर
हो गये हो प्रासंगिक
अपनी उन्हीं संततियों के लिए
जो भूल चुकी थीं तुम्हें
अज्ञान के ॲंधेरों से आवेष्टित,
फिर एक बार रखो तुम
अपनी शीतल हथेली
मनुष्यता के दहक रहे मस्तक पर,
करो एक बार फिर
‘धर्म चक्र प्रवर्तन’
प्रशस्त करो मार्ग फिर
दुखों से मुक्ति का।

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