आज रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जो टैगोर उपनाम से भी प्रसिद्ध है, जन्मदिवस है। महात्मा गांधी ने उन्हें गुरुदेव कहा था, ऐसे ही विश्वकवि और कविगुरु के रूप में उनकी प्रसिद्धि थी। इन नामों की सिद्धि उनमें सहज देखी जा सकती है। भारत सहित विश्व भर में राष्ट्रवाद के नाम पर मनुष्य की गरिमा की हिंसा दिख रही। ऐसे में गुरुदेव को पढ़ना, समझना और व्यवहार में लाना आवश्यक हो जाता है।
गुरुदेव के राष्ट्रवाद का आधार पूर्णतः भारतीय है, यह किसी सीमा से अधिक मनुष्यता के क़रीब है। इसका मूल “विश्वबन्धुत्व” है। उपनिषद् के ऋषि जिसके उद्गाता हैं “वसुधैव कुटुंबकम” ।
आज ऐसी धारा चल पड़ी हो कि पड़ोसी को भी संदिग्ध दृष्टि से देखा जाए और पांथिक राष्ट्रवाद की बयार में अपने ही नागरिकों पर असहमतियों के कारण देशद्रोही तक कहने का चलन आम है। जंसिता केरकेट्टा की कविता आज के पांथिक राष्ट्रवाद के विषाणु का कथ्य प्रस्तुत करती है-
जब मेरा पड़ोसी
मेरे खून का प्यासा हो गया
मैं समझ गया
राष्ट्रवाद आ गया
पांथिक कट्टरता के कारण हुए मोबलिंचिंग के मूल में यह पांथिक राष्ट्रवाद ही है। यह सबकुछ हो सकता है पर भारतीय राष्ट्रवाद नहीं। यह मुसोलिनी और हिटलर से प्रभावित राष्ट्रवाद है। भारतीय राष्ट्रवाद के आधुनिक ऋषि गुरुदेव लिखते है- “मैं राष्ट्र-विशेष के ख़िलाफ़ नहीं हूँ, बल्कि सभी राष्ट्रों की अवधारणा के खिलाफ हूँ। राष्ट्र आख़िर है क्या?
राष्ट्र का आशय लोगों की संगठित शक्ति से है। अपनी आबादी पर इस संगठन का हमेशा ही यह ज़ोर रहता है वे दक्ष और ताक़तवर बनें। लेकिन ताकत और हठता का यह हठ मनुष्य की वह ऊर्जा सोख लेता है,जो उसके सृजनशील और आत्मबलिदान वाले गुणों का स्रोत है। इसका नतीजा यह होता है कि त्याग करने की मनुष्य की शक्ति अपने नैतिक और परम उद्देश्य से भटककर इस संगठन के रख-रखाव में लग जाती है, जो नैतिक के मुक़ाबले सिर्फ़ यांत्रिक है। इस यांत्रिकता में ही वह नैतिक उत्कर्ष की सारी सन्तुष्टि महसूस करने लगता है और इस तरह मानवता के लिए बेहद ख़तरनाक हो जाता है। अपने दायित्व इस मशीन पर छोड़कर बड़ी आसानी से वह अपनी अन्तरात्मा की आवाज़ से मुक्ति महसूस करने लगता है, जबकि मशीन उसकी बुद्धिमत्ता का नतीजा है, न कि उसके सम्पूर्ण नैतिक व्यक्तित्व का। आज़ादीपसन्द लोग भी इसी युक्ति से दुनिया के एक बड़े हिस्से में गुलामी क़ायम रखते हैं और इसी में अपने कर्तव्यपालन के गर्व की सहज अनुभूति करते हैं; स्वभावतः न्यायप्रिय मनुष्य भी अपने विचारों और अपने काम में क्रूर और प्राप्त अन्यायी हो सकते हैं, और तो और, उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे दुनिया को उसके कर्मों का फल पाने में मदद कर रहे हैं; ईमानदार लोग भी अपनी उन्नति के लिए आँख मूँदकर दूसरों के मानवीय अधिकारों पर डाका डाल सकते हैं, और ऐसा करते हुए वंचितों को वे यह कहकर कोस भी सकते हैं कि वे इसी के पात्र हैं। अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हमने देखा है कि छोटे-छोटे कारोबारी और पेशेवर संगठन भी अच्छे-भले लोगों में बेरहमी की भावना भर देते हैं, और ऐसे में जब धन और बल की ख़ातिर दुनिया-भर में लोग तेज़ी से संगठित हो रहे हैं, इससे होनेवाले नैतिक विनाश का अन्दाज़ हम सहज ही लगा सकते हैं।
राष्ट्रवाद एक बड़ा ख़तरा है। यही वर्षों से भारत में मुश्किलों की वजह भी रहा है। और चूँकि हम पर ऐसे राष्ट्र का शासन और प्रभुत्व रहा है, जिसका नज़रिया ख़ालिस राजनीतिक है, और अतीत की अपनी समृद्ध विरासत होने के बावजूद हम सम्भावित राजनीतिक नियति में भरोसा करने की कोशिश करते रहे हैं।” (भारतीय राष्ट्रवाद; सं०- एस० इरफ़ान० हबीब/ पृ०- १६२/ राजकमल प्रकाशन)
पृथ्वी पर रहने वाले लोगों का भाग्य मुट्ठीभर नेता तय कर एक यांत्रिक लकीर खींच एक ऐसे संग्राम में यंत्रवत भेज मनुष्यता को अभिशापित कर देते है। भारतीय प्रायद्वीप ही देखिए, रातोरात एक बड़े समुदाय के लिए पुण्यभूमि और तीर्थ माने जाने वाली भूमि अपवित्र और दुश्मनों की भूमि हो जाती है। आज के टीवी चैनलों की बहस, कवि सम्मेलनों से लेकर वह सारे संस्थान जो मनुष्य के अवचेतन में विचार बीज बोते हैं, पांथिक राष्ट्रवाद की घृणित वकालत करते है। इसका परिणाम हम जमीनी तौर पर देख सकते है। न केवल भारत में अपितु बांग्लादेश, पाकिस्तान और म्यांमार तक में धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों पर अत्याचार और त्रासदी हाल के वर्षों में देखा जा सकता है।
राष्ट्र के तकनीकी बँटवारे और निर्माण पर गुरुदेव लिखते है – “राष्ट्र के उद्भव के दौरान भाईचारे की नैतिक संस्कृति भौगोलिक सीमाओं में बँधी हुई थी, क्योंकि तब वे सीमाएँ ही वास्तविक थीं। अब तो वे वास्तविक अवरोधों के बजाय रूढ़ि की काल्पनिक लकीरें बन गई हैं। तो अब यह मनुष्य की नैतिकता का तक़ाज़ा है कि वह इस सच्चाई का पूरी गम्भीरता से सामना करे या फिर ख़त्म हो जाए। बदले हुए हालात में सबसे पहला आवेग तो मनुष्य के लालच और अमानवीय घृणा की बुनियाद हिला डालने और इनसे छुटकारा पाने का होना चाहिए। यही हाल अगर अनन्त काल तक बना रहता है, और हथियारों का जखीरा जमा करने की अन्धाधुन्ध होड़ जैसी अकल्पनीय मूर्खताएँ जारी रहती हैं, अगर मशीनें और ये भंडार अपनी गन्दगी, धुएँ और भद्देपन से इस ख़ूबसूरत धरा को ढाँप लेते हैं, तो इसका नतीजा समूची मानवता की खुदकुशी ही होगा। इसलिए मनुष्य को प्रेम की अपनी सारी ताक़त लगानी होगी, और एकदम साफ़ नज़रिये से ऐसा नैतिक समाज बनाना होगा, जिसमें पूरी दुनिया के मनुष्य शामिल हों, न कि राष्ट्रीयता की पहचान वाले अलग-अलग समूह। मौजूदा समय में हरमनुष्य से यह आह्वान है कि एक नये युग में दाखिल होने के लिए वह ख़ुद को और अपने परिवेश को इस तरह गढ़ता रहे कि समूची मानवता की आध्यात्मिक एकता में मनुष्य की स्वयं की तलाश पूरी हो सके ।” (वहीं, पृ०- १५७-१५८)
गुरुदेव की मानवतावादी दृष्टिकोण सफल हो, मनुष्यता का रक्षण हो, इस शिव संकल्प के साथ कोटिशः नमन।
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