— महापंडित राहुल सांकृत्यायन —
पाँव फट गए थे, इसलिए पैदल का खयाल छोड़ हरिद्वार में रेल पकड़ी। लक्सर में उतार दिया और मुरादाबाद में भी; लेकिन उतरते-चढ़ते आखिर बनारस पहुँच गए। शायद फिर किसी ने योगी की आशा दिलाई। फिर गंगा किनारे पैदल ही चल पड़े – अब की पूरब की ओर। बलिया तक गए, कहीं न योगी, न योगी की पूँछ दिखाई पड़ी। वर्षा आ गई थी, भरौली (उजियार) में चौमासा रहे। सोचा, अब छोड़ो योगियों के परपंच को, जिनको लोग योगी समझते हैं, वह हमारे लिए दिन के सोनेवाले या कायाकल्प करनेवाले से अधिक नहीं होते। अब अच्छा यही है कि चल कर संस्कृत पढ़ो; फिर यदि कोई वास्तविक योगी मिल गया तो देखा जावेगा।
बनारस में विद्याध्ययन – 1909 से बनारस में डटकर संस्कृत पढ़ने लगे। अपारनाथ के मठ में ठहरे। पास ही संन्यासी पाठशाला में अपने समय के प्रसिद्ध व्याकरणी पंडित हरिनारायण तिवारी पढ़ाते थे। उनसे सिद्धांत कौमुदी शुरू की। ढाई वर्ष लगाकर उसे खूब मन से पढ़ा। पढ़ाई आगे जारी ही रही। संस्कृत की जड़ मजबूत हो गई। पाठशाला के दूसरे अध्यापक शंकर भट्टाचार्य से न्याय पढ़ते थे। पं. नित्यानन्द पंजाबी मीमांसा और एक बलियावाले पं. वेदांत पढ़ाते थे। संन्यासी के लिए काशी में दुख क्या? पाँच क्षेत्रों में घूम जाते और भोजन के लिए पर्याप्त मधुकरी मिल जाती। रहते कभी किसी मठ में कभी किसी मठ में। विरक्त संन्यासी थे, इसलिए परीक्षा देने का कभी खयाल नहीं आया।
स्वामी अब (1912 में) 23 साल के थे। अभी भी योग और दिव्य-शक्ति पर से उनका विश्वास उठा नहीं था। टक्कर मार कर असफल होने के बाद वह इतना ही समझ पाए थे कि योगी अब कलियुग में दुर्लभ हैं, भाग्य से ही कहीं मिल जाएँ। एक दिन उन्होंने एक बूढ़े दंडी संन्यासी का पता पा, जाकर उनके दर्शन किए। वहाँ एक चमत्कार देखने में आया – दंडी खर्राटे भरते सो रहे हैं और उनकी अंगुलियाँ माला के मनके गिन रही हैं। स्वामी अद्वैतानन्द सरस्वती – यही दंडी का नाम था – सीधे-सादे साधु थे, कुछ पढ़े-लिखे भी। तरुण संन्यासी ने जिसके लिए घर छोड़ा था, पूरा नहीं तो उसमें से कुछ तो मिला। स्वामी बार-बार जाने लगे। दंडी जी ने दंड ले लेने के लिए कहा। आखिर शंकराचार्य भी तो दंडी थे! अभी तक अपारनाथ के गिरि थे। अब उन्होंने स्वामी अद्वैतानन्द सरस्वती का शिष्य सहजानन्द सरस्वती बन दंड धारण किया। अद्वैतानन्द बड़े पंडित न थे कि सहजानन्द को उनसे ज्यादा ज्ञान प्राप्त होने की आशा होती। वह भक्ति-भाव वाले आदमी थे। भक्तिपूर्ण कथा-प्रसंगों को सुनते वक्त उनकी आँखों से आँसू की धारा बह चलती। उनकी एक मुख्य शिक्षा थी – ‘अवगुणग्राही साधु, गुणग्राही असाधु जो कि लोक-प्रसिद्ध कहावत ‘गुणग्राही साधु, अवगुणग्राही असाधु’ का उलटा है, और जिसका अर्थ है, साधु पराए के गुणों को ग्रहण करते हैं और असाधु पराए के अवगुणों को। अद्वैतानन्द अपने सूत्र का अभिप्राय लेते थे – ‘साधु अपने अवगुण को पकड़ते और असाधु अपने गुणों को।’
दंडी होने पर स्वामी सहजानन्द के नियम कुछ कड़े हो गए; लेकिन दंडियों का काशी में (और बाहर भी) बहुत मान है, पढ़ना पहले ही की तरह जारी रहा। व्याकरण में मनोरमा, शेखर और महाभाष्य पढ़ा। वात्स्यायन-भाष्य, न्यायवर्तक, तात्पर्य-टीका, न्याय कुसुमांजलि, आत्मतत्व विवेक जैसे प्राचीन न्याय के प्रौढ़ ग्रन्थों का अध्ययन किया। नैयायिक जीवनाथ मिश्र से पक्षता, सामान्य निरुक्ति, सिद्धांत-लक्षण तथा वाद के ग्रन्थ पढ़े। वेदांत तो अपने घर का जरूरी विषय था, उसके पढ़ानेवालों में बलिया के पं. अच्युतानन्द त्रिपाठी थे। उनसे उन्होंने खण्डनखण्ड खाद्य, संक्षिप्त शारीरिक, अद्वैतसिद्धि आदि ग्रन्थ पढ़े। जब वह मीमांसा में न्याय-रत्नमाला आदि ग्रन्थों को पढ़कर आगे बढ़ना चाहते थे, उस वक्त देखा कि उनके अध्यापकों को कठिनाई हो रही है। संतोष नहीं होता था। खुद सिर पटकने की कोशिश की; मगर उससे काम बनते नहीं दीख पड़ा। अब (1915 में) वह किसी प्रौढ़ मीमांसक गुरु की खोज में थे। साहित्य में नैषध आदि पढ़े थे। मगर योग-वैराग्य के शैदाई सहजानन्द को ये श्रृंगारपूर्ण ग्रन्थ पसंद न आते थे। पुराने युग की पुरानपंथी संस्कृत पुस्तकों तथा योग-वैराग्य के अतिरिक्त और भी दुनिया है, इसका स्वामी को पता न था।
मीमांसा की प्यास बुझी न थी। पता लगा दरभंगा के चित्रधर मिश्र नामक एक बड़े मीमांसक हैं। 1915 में वहाँ पहुँच गए और उन्हीं के पास 7 मास रह कर मीमांसा के कितने ही ग्रन्थ पढ़े। कुमारिल की दुर्लभ पुस्तक टुप्टीका को हाथ से लिख कर पढ़ा। पं. बालकृष्ण मिश्र भी उस वक्त वहीं थे। उन्होंने बड़े स्नेह से स्वामी को वाद (न्याय) तथा काव्यप्रकाश पढ़ाया। चलते वक्त अपने प्रतिभाशाली शिष्य – परंतु धर्म में गुरु को अपने गुरु द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक भेंट की, जिस पर अपने हाथ से यह स्वरचित पद्य लिख दिया :
प्रेमैव माऽस्तु यदि स्यात् सुजनेन नैव,
तेनापि चेद् गुणवता न समं कदाचित्।
तेनापि चेद् भवतु नैव कदापि भङ्गो
भङ्गोऽपि चेद् भवतु वश्यमवश्यमायु:॥
‘प्रेम ही मत हो, यदि हो तो सृजन के साथ नहीं, उससे भी हो तो गुणी के साथ कभी न हो। उससे भी हो तो कभी भी (प्रेम का) भंग न हो, भंग भी हो तो आयु अपने वश में जरूर हो।’
एक महायुद्ध हो रहा हो, हो नहीं सकता कि स्वामी सहजानन्द ऐसा तीव्र बुद्धि का व्यक्ति अपनी चिर-समाधि को भंग न करे। 1915 से युद्ध की खबरों के लिए स्वामी को अखबार पढ़ने की चाह लगी। बाहर की दुनिया का ज्ञान जैसे-जैसे बढ़ता ही जा रहा था, वैसे-वैसे राजनीति में भी दिलचस्पी बढ़ चली। समस्तीपुर (दरभंगा) में उन्होंने फीरोजशाह मेहता के मरने की खबर पढ़ी और यह भी समझा कि संसार में देशभक्ति भी कोई चीज है। लखनऊ-कांग्रेस में हिंदू-मुस्लिम समझौता हुआ, उसे भी उन्होंने पढ़ा। वह ‘प्रताप’ (कानपुर) को नियमपूर्वक पढ़ते थे, जिससे भारत की राजनीतिक अवस्था की झलक थोड़ी-थोड़ी सामने आने लगी। ‘प्रताप’ में तिलक की मृत्यु के बारे में इस पद्य को पढ़ कर बड़े प्रभावित हुए –
मुद्दतें काट दीं असीरी में, था जवानी का रंग पीरी में।
अब कहाँ मुल्क का फिदाई हाय, मौत उस मौत को न आयी हाय॥
स्वामी ने इसे पढ़कर एक दिन-रात खाना नहीं खाया। अब उनकी नजर गांधी जी की ओर लगी हुई थी। जलियाँवाला बाग कांड सुन कर उन्हें सख्त धक्का लगा। उसके बारे में हंटर की सरकारी रिपोर्ट को उन्होंने खूब अच्छी तरह पढ़ा। उसी वक्त ‘खयाली क्रांति और कैसे उसे दबाया गया’ नामक एक अंग्रेजी पुस्तक उनके हाथ आई। सुख-दु:ख अनुभव करने का एक नया संसार उनके सामने खड़ा हो गया। संस्कृत साहित्य में गोता लगाना छूट गया। ढूँढ़-ढूँढ़ कर रोज-रोज की ज्ञातव्य राजनीतिक बातें पढ़ते, अब उनके भाव देश के परतन्त्रकारियों के विरुद्ध हो गए। मृत्यु-शय्या पर पड़े तिलक को देखने गांधी जी बंबई के सरदारगृह में गए। तिलक ने कहा – ‘Non-co-operation’ चुप रहकर फिर ‘Very high method ‘ यह कहते हुए लोकमान्य ने आखिरी साँस ली। स्वामी ने कहीं पर ये बातें पढ़ीं।
1920 में गांधी जी पटना आए। वहाँ मौलाना आज़ाद और कई दूसरे नेताओं के व्याख्यान सुने। आज़ाद के व्याख्यान का बहुत असर पड़ा। 5 दिसंबर को वे मौलाना मजहरुल्हक के मकान पर गांधी जी से बात करने गए। संन्यास पर कुछ बात चली, फिर गांधी जी की राजनीति पर स्वामी ने तर्क करना शुरू किया और कहा कि खिलाफत के सवाल के हल हो जाने के बाद महम्मदअली शौकतअली मुल्क को धोखा तो नहीं देंगे? गांधी जी ने कहा – ‘हम तर्क नहीं जानते, धोखा नहीं देंगे।’ आरा की सभा में गांधी जी ने संन्यासी के इस वार्तालाप का जिक्र किया था। अब स्वामी ने निश्चय किया – देश की सेवा बड़ी चीज है, मैं मुल्क की सेवा करूँगा।
राजनीतिक क्षेत्र में – स्वामी नागपुर कांग्रेस में गए। लौटकर (1921 में) बक्सर चले गए और वहीं काम शुरू किया। कांग्रेस ने कौंसिलों के बायकाट का निश्चय किया था। हथुआ के महाराजा (जो खुद भूमिहार ब्राह्मण हैं) कौंसिल के लिए खड़े हुए। कांग्रेस के लोगों ने एक अनपढ़ धोबी को उनके खिलाफ खड़ा किया। स्वामी जी ने सभा में बोलते हुए कहा था – ‘राजा-महाराजा से हमारा धोबी कहीं अच्छा है।’ धोबी जीत गया। वहाँ तिलक स्वराज्य फंड के लिए चंदा जमा करने में सहायता की। कुछ लोगों ने रुपयों में गड़बड़ी की, जिसके कारण स्वामी जी का मन बिदक उठा और वे कांग्रेस का काम करने के लिए गाजीपुर चले गए।
अहमदाबाद कांग्रेस (1921) से लौटने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। सजा पाकर गाजीपुर, बनारस, फैजाबाद, लखनऊ की जेलों की हवा खाते रहे। वहाँ पर भी आदर्शवादी स्वामी के हृदय में गांधी अनुयायियों की कितनी ही बातें खटकती थीं – (1) गांधी-सिद्धांत को वे दिखाने के लिए मानते थे; (2) कृपलानी, संपूर्णानन्द-जैसों का हिंदू-मुस्लिम-एकता में विश्वास नहीं था, तो भी वे उसका अभिनय करते थे; (3) फजूल बात के लिए जेलवालों से झगड़ते रहते; (4) जब राजनीतिक बन्दियों के डिवीजन (विभाग) का सवाल आया, तो लोगों का रुख देखकर पहले तो कह दिया – ‘हम हलवा खाने जेल नहीं आए, हम चक्की चलाने आए हैं’; लेकिन जब डिवीजन कर के फैजाबाद भेज दिए गए, तब बाँदा के एक तिलक-भक्त ने रोज आधा-सेर घी पाने के लिए भूख-हड़ताल कर दी। यह गलत बात है – इसे बहुत-से लोग मानते थे, तब भी दूसरों ने साथ दिया। खैर, हड़ताल तो टूटनी ही थी, चार दिन बाद सबने फिर खाना शुरू किया।
जनवरी (1923) में स्वामी जेल से छूट कर गाजीपुर लौट आए और कांग्रेस का काम करते रहे। अब आंदोलन शिथिल हो चला था। शिथिलता का प्रभाव स्वामी पर भी पड़ रहा था। 1924 में वे सेमरी (बिहार) चले गए और वहाँ ‘कर्मकलाप’ नामक पुस्तक लिखी।
अब बिहार में कांग्रेस ने कितने ही डिस्ट्रिक्ट बोर्डों को दखल कर लिया था। सरकार परस्तों के सिरमौर सर गणेशदत्त सिंह (भूमिहार) मिनिस्टर थे। स्वामी जी का प्रभाव वे जानते थे, इसलिए उनकी बहुत लल्लोचप्पो करते थे। लोग बराबर उनका कान भरा करते थे कि कायस्थ कांग्रेस के नाम पर भूमिहारों के प्रभाव को खत्म कर देना चाहते हैं। बिहार के बड़े जमींदारों में बहुत अधिक संख्या भूमिहारों की है, यह स्वामी जी जानते थे। साथ ही साथ वे यह भी जानते थे कि कांग्रेस कर्मियों में उनकी संख्या कम नहीं है। इसलिए भूमिहारों का अस्तित्व खतरे में, यह बात तो उनके मन में नहीं आती थी; लेकिन तब भी गढ़-गढ़ कर कितने ही उदाहरण उनके सामने पेश किए जाते थे। सर गणेश ने एक बार बड़े तपाक के साथ स्वामी जी के सामने कहा था – ‘पहले देश, फिर बिरादरी’; लेकिन जब गया डिस्ट्रिक्ट बोर्ड को उन्होंने कांग्रेसियों के हाथ से निकालने के लिए तोड़ दिया, तो स्वामी जी के मन पर इसका बहुत बुरा असर हुआ। सर गणेश ने बताया कि गवर्नर ने जबरदस्ती ऐसा कराया।
1926 आया। कांग्रेस ने कौंसिलों में जाना तय किया और भिन्न-भिन्न चुनाव-क्षेत्रों के लिए कांग्रेसी उम्मीदवार खड़े किए जाने लगे। उस वक्त कुछ योग्य कांग्रेस कर्मियों को ठुकरा कर दूसरों को वे स्थान दिए गए। स्वामी जी के आस-पास अब भी जात-पाँत की मनोवृत्तिवाले लोग ज्यादा रहते थे। उन्होंने कायस्थ-पक्षपात, भूमिहार-विद्वेष आदि कह कर भड़काना शुरू किया। स्वामी जी ने अन्याय के खिलाफ गांधी जी को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखा; लेकिन कोई उत्तर नहीं आया। सर गणेश और बाबू रजनधारी सिंह जैसे गणमान्य नेता स्वामी जी का चरणामृत ले रहे थे। अन्त में स्वामी जी को खींचने में वे सफल हुए। एक चुनाव-क्षेत्र में स्वामी जी और इन पंक्तियों के लेखक दो विरोधी उम्मीदवारों के समर्थक थे। यद्यपि लेखक मानता था और जिले के अधिकांश कांग्रेस कर्मी भी समझते थे कि जिस उम्मीदवार का स्वामी जी समर्थन कर रहे हैं, उसने कांग्रेस के लिए ज्यादा काम किया है, वह ज्यादा जनप्रिय है; किंतु जब कांग्रेस ने दूसरे उम्मीदवार को खड़ा कर दिया, तो कांग्रेसियों के लिए उसका समर्थन करने के सिवाय और कोई चारा नहीं था।
धीरे-धीरे स्वामी जी को बिलय्या भक्तों का पता लग गया। भूमिहार ब्राह्मण महासभा के सभापतित्व के लिए जब मेरठ के कांग्रेस-नेता चौधरी रघुवीर नारायण सिंह का नाम आया, तो उन्होंने किसी राजा-महाराजा को उस जगह बैठाना चाहा। खैर, वे इसमें सफल नहीं हुए और चौधरी साहब ही सभापति बने। गया डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के तोड़ने के बारे में स्वामी जी ने सर गणेश को फटकारते हुए कहा – ‘अब तुम्हारे यहाँ हम फिर नहीं आएँगे।’
किसानों के नेता – भूमिहार सामंतों और जमींदारों की मनोवृत्ति को भीतर से देखकर स्वामी जी की आँखें खुलने लगीं। वह समझने लगे कि मुट्ठी-भर जमींदारों, राजा-महाराजाओं के सिवाय सबकी-सब भूमिहार जनता किसान है और इन दोनों के हित एक-दूसरे के खिलाफ हैं। भूमिहार किसानों और गरीबों के वही हित हैं, जो कि भारत के सभी किसानों और गरीबों के। इसलिए सबका उद्धार भारत के सारे किसान-वर्ग के उद्धार में ही है। अब वह पटना जिले में ज्यादा रहते थे। वहीं उन्होंने पहले-पहल भूमिहार किसानों से भूमिहार जमींदारों के अत्याचार सुने। इसके लिए 1927 के अन्त में उन्होंने पश्चिम पटना किसान-सभा बनाई। अभी भी उनका विश्वास था कि परस्पर सहयोग से किसान और जमींदार का भला हो सकता है; लेकिन साथ ही वह समझते थे कि किसानों के मजबूत हुए बिना जमींदार सहयोग नहीं करेंगे। 4 मार्च, 1928 को स्वामी जी ने पश्चिम पटना किसान सभा का बाकायदा संगठन किया। एक पैसा मेम्बरी फीस रखी गई। घूम-घूम कर गाँवों में किसानों के हित पर स्वामी जी व्याख्यान देने लगे – भरतपुरा के भूमिहार जमींदार की जमींदारी के गाँवों में सभाएँ खासतौर से ज्यादा हुईं।
अगले साल तथा 1929 का भी बहुत-समय बीत गया, स्वामी जी उसी तरह अपनी धुन में लगे हुए थे। उसी साल बिहार में काश्तकारी कानून में सुधार करने की बात जोर-शोर से चलने लगी। सरकार किसानों के रुख को समझ रही थी और चाहती थी कि जिन अत्याचारों के बोझ से – नाजायज नजरानों और करों के बोझ से किसान जनता पिसी जा रही है, उन्हें कुछ कम करना चाहिए, नहीं तो यह मवाद भयंकर हो उठेगा। जमींदारों को भी अभी किसी कांग्रेसी मिनिस्टरी का तजुर्बा न था। वे समझते थे कि कांग्रेसी नेता जिन लंबी-लंबी बातों को कहते हैं, मिनिस्टर बन कर वैसा कर बैठेंगे; इसलिए चाहते थे कि सौदा सस्ते में इसी समय पटा लिया जावे। उधर किसानों के भी कुछ नामधारी प्रतिनिधि थे, जो कि कुछ मामूली सुधार कराकर अगले चुनाव के लिए अपने वास्ते रास्ता साफ करना चाहते थे। लेकिन, सरकार ने कह दिया कि जमींदारों और किसानों के समझौते से जो बिल पेश होगा, सरकार उसी का समर्थन करेगी। उस समय एक जमींदार मुखिया ने जमींदारों की ओर से एक बिल पेश किया था और कांग्रेस के भगोड़े एक दूसरे सज्जन ने किसानों की ओर से एक दूसरा बिल रखा था। मिनिस्ट्री के रस से अनभिज्ञ कांग्रेसी नेता घबड़ा रहे थे कि कहीं दोनों समझौता कर के कोई कानून न पास कर दें और श्रेय उनको मिल जावे। कांग्रेस नेता बाबू रामदयालु सिंह (पीछे असेंबली के स्पीकर) ने स्वामी जी के पास आकर कहा कि किसान-सभा का काम जोर से होना चाहिए और सारे प्रांत के किसानों का संगठन करना चाहिए। इससे 8 साल पहले 1921 में सोनपुर-मेला के समय इन पंक्तियों के लेखक ने भी कुछ कांग्रेसकर्मियों को मिलाकर एक बिहार प्रान्तीय किसान-सभा कायम की थी; मगर यह बात समय से बहुत पहले की गई; इसलिए वह सिर्फ कागजी रह गई। अब स्वामी जी के किसानों में ठोस प्रचार तथा कांग्रेस-विरोधियों की चाल से भयभीत कांग्रेस-नेताओं के सहयोग से उसी सोनपुर मेले में 17 नवंबर (1929) को प्रान्तीय किसान-कॉन्फ्रेंस हुई। कॉन्फ्रेंस के सभापति थे स्वामी सहजानन्द सरस्वती। उन्होंने काश्तकारी बिल के षडयंत्र की पोल खोली और उसका खूब विरोध किया। प्रांत के कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता वहाँ मौजूद थे। प्रस्ताव आया, सारे प्रांत की एक किसान-सभा बनाई जावे। बेनीपुरी ने कांग्रेस के कमजोर हो जाने की बात कह कर उसका विरोध किया, स्वामी जी ने समर्थन किया। प्रस्ताव पास हुआ। बिहार प्रान्तीय किसान-सभा का पहला चुनाव हुआ :
– सभापति – स्वामी सहजानन्द सरस्वती
– मन्त्री – बाबू श्रीकृष्ण सिंह (पीछे बिहार के मुख्यमन्त्री)
मेम्बरों में बाबू राजेंद्र प्रसाद, बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद, बाबू रामदयालु सिंह (पीछे असेंबली के स्पीकर), बाबू अनुग्रहनारायण सिंह (पीछे बिहार के अर्थ-सचिव) आदि सभी कांग्रेस के प्रमुख नेता थे। ब्रजकिशोर बाबू ने यह कहकर उसमें रहना पसंद नहीं किया कि यह बहुत खतरनाक काम हो रहा है। पीछे ब्रजकिशोर बाबू की बात सच निकली, या यों कहिए दूसरे नेताओं ने अपनी क्षमता को जाने बिना ही इतना भारी जोखिम अपने सिर पर लेना चाहा।
लाहौर कांग्रेस (1930) के पहले बिहार में वल्लभ भाई पटेल आए। जगह-जगह बड़ी-बड़ी सभाएँ हुईं। स्वामी जी अपने व्याख्यानों से किसानों में नया जोश भर रहे थे। वल्लभभाई भी उसी सभा में किसानों को उत्साहित कर रहे थे। सीतामढ़ी में वल्लभ भाई ने कहा – जमींदारों की क्या जरूरत? पकड़ कर दबा दूँ तो चूर-चूर हो जाएँ। अभी बात बनाने का समय था, काम करने का नहीं, वह तो सात वर्ष बाद आनेवाला था, फिर ‘वचने का दरिद्रता’ मुंगेर में प्रान्तीय राजनीतिक सम्मेलन हुआ। वहीं प्रान्तीय किसान-कॉन्फ्रेंस भी हुई। कॉन्फ्रेंस ने प्रस्ताव पास किया कि राजनीतिक मामलों में किसान-सभा कांग्रेस के विरुद्ध नहीं जावेगी; किसान-सभा सरकारी काश्तकारी बिल का विरोध करती है और गवर्नमेंट को चाहिए कि उस बिल को उठा ले। पीछे सरकारी मेम्बर ने कौंसिल में यह बात कहते हुए बिल को वापस ले लिया कि किसान-सभा इसका विरोध कर रही है। किसानों के कौंसिली स्वयंभू नेता उस वक्त मुँह ताकते रह गए।
लाहौर कांग्रेस के बाद स्वतन्त्रता दिवस (26 जनवरी, 1930) आया। नमक-सत्याग्रह छिड़ा। स्वामी जी पकड़कर छह महीने के लिए हजारीबाग जेल में बंद कर दिए गए। गांधी-भक्त नेताओं की कमजोरियाँ पहली जेलयात्रा की तरह अब अभी दिखलाई पड़ने लगीं। जरा-जरा-सी सुविधा के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते थे। स्वामी जी को बहुत शोक हुआ। अभी भी राजनीति में स्वामी जी गांधीवादी थे। उनको घोर निराशा हुई – ऐसे चरित्रहीन लोग कैसे स्वराज्य लेंगे? राजनीति से वे अब उदास हो चले। सन 1931 आया। स्वामी जी अब 42 साल के थे। अब उनका ज्ञान और तजुर्बा बहुत विस्तृत था। घर छोड़ते समय उनके सामने जो आदर्श थे, उनका स्थान एक दूसरे उच्चतर आदर्श ने ले लिया था। वैयक्तिक मोक्ष की जगह वे अब सारी जनता को मुक्त देखना चाहते थे। जनता में भी गरीबी और अत्याचार से अत्यन्त पीड़ित किसान ही उनके हृदय में सबसे अधिक स्थान रखते थे। वे किसानों से अलग शहरों के मुहल्लों में बैठकर किसानों का हित-चिंतन नहीं करते थे। वे गाँवों में घूमते, जहाँ कोई किसान आकर कहता – ‘स्वामी जी, हमारे जुतते खेत में से छीनकर हमारे हल-बैलों को जमींदार के आदमी ने जिरात (सीर) जोतने में लगा दिया।’ कोई कहता – ‘हम नाजायज नजराना और रसूमों के साथ मालगुजारी हर साल बेबाक करते रहते हैं; लेकिन जमींदार रसीद नहीं देता, हमारे ऊपर सूद और तावान के साथ 4-4 साल की बाकी मालगुजारी की डिग्री करवाकर हमको तबाह कर रहा है।’ कहीं वे सुनते कि गाय-भैंस न रहने से मुफ्त दूध न दे सकने पर जमींदार ने अपने आदमी से किसान की स्त्री का दूध निकलवाया। कहीं वे देखते, किसानों की बहू-बेटियों की इज्जत जमींदारों के हाथ लुटते देखकर भी कानून कुछ भी मदद करने में असमर्थ है। वे संसार को सुखी देखना चाहते थे और देख रहे थे जनता की सबसे अधिक संख्या – सबसे मेहनती-समुदाय किसानों की नरक की जिंदगी भोगती। यह भावनाएँ थीं, जिन्होंने स्वामी जी को किसान-सभा तक पहुँचाया। लेकिन, वेदांती, आदर्शवाद, संन्यासियों का एकांती जीवन और उच्च सदाचार के हाथ में तराजू – ये बातें अब भी उनके दिमाग पर जबर्दस्त प्रभाव रखती थीं। इसीलिए जब उनकी अपनी पुरानी भावुक वृत्तियों पर किसी ओर से चोट पहुँचती, तो उनका कोमल भावुक हृदय तिलमिला उठता। इस तिलमिलाहट में उनका हृदय जनता की व्यथावाले भाग को भूल जाता और सिर्फ अपनी तत्कालीन चोट को लेकर पुन: 18 साल की उम्र में गाजीपुर से भागने का अभिनय करता।
1931 में बिहार में किसानों की दुर्दशा की कांग्रेस की ओर से जाँच हुई। नेताओं ने लंबे-लंबे व्याख्यान दिए। लेकिन उसके परिणामस्वरूप जो परिवर्तन करने पड़ते, उन पर बिहारी कांग्रेस-नेता जो कि खुद जमींदार थे, अभी दूर तक सोच नहीं सके थे। 1932 के आंदोलन में स्वामी जी शामिल नहीं हुए। दोस्तों ने बहुत कहा, मगर उनका भावुक हृदय हजारीबाग के जेल के दृश्य को भूल नहीं सकता था। लेकिन इसी वक्त दूसरी परिस्थितियाँ उपस्थित हुईं और अपने हृदय के गहन कोने में छिपे स्वामी को फिर बाहर आने के लिए मजबूर होना पड़ा। कुछ अवसरवादी लोगों ने एक और किसान-सभा बनाई। किसानों के कुछ स्वयंभू नेता कौंसिल में इस नकली किसान-सभा की मदद से फिर कोई कानून पास करवा लेना चाहते थे। इस समय कौंसिल के कांग्रेसी मेम्बर जेलों में बंद थे, यह उनके लिए सुनहरा अवसर था। इन स्वयंभू किसान-नेताओं ने – जो कि सरकार और जमींदारों के हाथ में खेल रहे थे – जमींदारों के साथ चुपके-चुपके एक समझौता भी कर डाला था और चाहते थे कि उसे उस नकली किसान-सभा से मंजूर करा लिया जावे। 1933 की जनवरी के मध्य में उक्त किसान-सभा को बुलाने का दिन भी निश्चित कर लिया गया। स्वामी जी ने बहुत आश्चर्य से पत्रों में इस समाचार को पढ़ा। कुछ क्षोभ भी हुआ, मगर उन्होंने अपने को दबाया। एक किसान कार्यकर्ता स्वामी जी के पास दौड़े-दौड़े पहुँचे और खतरे की खबर देकर आगे आने के लिए कहा – ‘स्वामी जी आइए, नहीं तो सारा काम चौपट हो जावेगा।’ स्वामी जी ने दृढ़तापूर्वक ‘नहीं’ कहा। कार्यकर्ता ने बहुत तरह से समझाया, रात को देर तक गिड़गिड़ाते रहे; मगर स्वामी जी की ‘नहीं’ को नहीं बदल सके। किसान कार्यकर्ता को एक सख्त फोड़ा निकला हुआ था और उस पर से बुखार भी था, जिसके दर्द के मारे उनके मुँह से आह निकलती रहती थी। बीच-बीच में स्वामी जी के पास लेटे उस निस्तब्ध रात्रि में उनके मुँह से शब्द निकल आते – ‘स्वामी जी नहीं चलेंगे?… चलते तो… क्या करें!’ कार्यकर्ता के इन आह भरे शब्दों ने स्वामी जी को सोचने के लिए मजबूर किया। धीरे-धीरे उन्हें मालूम होने लगा कि यह आह एक किसान कार्यकर्ता की नहीं है, यह है करोड़-करोड़ पीड़ित किसानों के दिल की आह।
सवेरे बिना पूछे ही स्वामी जी ने कार्यकर्ता से कह दिया – ‘मैं चलूँगा।’
गुलाब बाग (पटना) में उक्त सभा की तैयारी थी। किसानों की सभा में राजा सूरुजपुरा और मिस्टर सच्चिदानन्द सिंह जैसों को भी बैठे देखकर स्वामी जी का माथा ठनका। सभा के संयोजकों में से एक ने बाबू गुरुसहाय लाल ने पूछा – ‘यह क्या?’ गुरुसहाय लाल ने जमींदारों के साथ हुए समझौते को स्वामी जी के सामने रखकर कहा – ‘इसे पास हो जाना चाहिए।’ स्वामी जी ने समझाना शुरू किया कि पास कराना है तो उसे चोरी-चोरी पास नहीं कराना चाहिए। प्रान्तीय किसान-सभा मौजूद है, उससे पास कराओ, दूसरी तारीख मुकर्रर करो। फिर समझौते की बात छेड़ी गई। स्वामी जी ने कहा – ‘समझौता किसने किया है?’ राजा साहब बोल उठे – ‘यह तो कुछ दो और कुछ लो का सवाल है।’ स्वामी जी ने सीधा जवाब दिया – ‘हाथी के लिए एक चावल देना कुछ भी नहीं है; किंतु चींटी के लिए वह जीने-मरने का सवाल है।’ गुरुसहाय लाल को स्वामी के सामने दबते देख कर मिलीभगतवाले लोगों को असंतोष हुआ। नामधारी किसान-सभा के एक नामधारी मन्त्री ने मिस्टर सिंह को धन्यवाद देने के लिए प्रस्ताव रखना चाहा। उस समय पता लगा कि सभा बुलाने में मिस्टर सिंह की उदारता सहायक हुई है। खैर, चाहे जैसे भी हो, लुक-छिप कर किसानों की सभा बुलवाई जावे, लोग स्वामी के प्रभाव, उनके तर्क और भाषण-शक्ति को जानते थे, और यह भी जानते थे कि स्वामी के विरोध करने पर कोई प्रस्ताव पास नहीं हो सकता। सिंह साहब को धन्यवाद नहीं मिला, उसका कितनों को खेद रहा। सभा में प्रस्ताव पास हुआ कि समझौते के मसौदे को छापकर बाँटा जावे और 30 मार्च को किसान-सभा की बैठक की जाय। उसी समय कौंसिल का भी अधिवेशन होनेवाला था। किसान-सभा 30 मार्च को तीसरे पहर से 10 बजे रात तक समझौते के हर पहलू पर विचार करती रही और सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ शिवशंकर झा किसानों के प्रतिनिधि नहीं हैं, गुरुसहाय लाल कौंसिल में जाकर बिल का विरोध करें, कोई इस तरह का कानून पास होना चाहिए। पीछे गुरुसहाय लाल को हिम्मत न हुई।
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