
भारतीय नागरिकता पर विदेश मंत्रालय के बयान के बाद देश में एक नए किस्म का भ्रम पैदा हो गया है। अब पासपोर्ट धारी लोग भी एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि जिस दस्तावेज के आधार पर हम विदेश में भारतीय नागरिक समझे जाते हैं क्या वह दस्तावेज महज यात्रा करने की एक परमिट है? चूंकि मौजूदा सरकार और सत्तारूढ़ दल के लोग यह बात बार बार कहा करते हैं कि विदेशी नागरिकों के घुसपैठ का मुद्दा किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है बल्कि वह राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा है इसलिए यह भ्रम अल्पसंख्यक समाज के साथ हिंदू समाज के मध्यवर्ग और दूसरे वर्गों में भी व्याप्त हो रहा है कि जब सरकार नागरिकता साबित करने के लिए प्रमाणपत्र मांगेगी तो उन्हें कौन कौन सा कागज(दस्तावेज) पेश करना पड़ेगा। और उसके लिए नोटबंदी, कोरोना और एसआईआर की तरह कितना हाहाकार मचेगा।
भ्रम की इस स्थिति में एक लतीफा याद आता है। एक राजा ने अपने एक कारिंदे को जंगल में ऊंट चराने के लिए भेजा। उस व्यक्ति ने ऊंटों की नकेल और उन्हें बांधने वाली रस्सियां खोल दीं ताकि वे आराम से जंगल में चर सकें और उन सबको लेकर एक पेड़ की छाया में आराम करने लगा। राज्य कर्मचारी को नींद आ गई और शासकीय सेवा के ऊंटों ने अपने को एकदम मुक्त समझ लिया। जब कर्मचारी की नींद खुली तो उसने देखा कि ऊंट कहीं है ही नहीं। बहुत ढूंढा लेकिन वे दिखे नहीं। शासकीय भय के मारे वह बदहवास हो गया। थोड़ी देर बाद जंगल के मार्ग से एक और शासकीय कर्मचारी गुजरते हुए दिखा, ऊंट वाले ने उसे नकेल और रस्सियां सौंपते हुए कहा कि ‘जाकर कह देना उनसे जिनके थे वे, पता नहीं कहां गए जिनके हैं ये’। ऐसा ही एक प्रसंग गैबरियल गार्सिया मार्खेज के उपन्यास ‘वन हन्ड्रेड ईयर आफ सालिट्यूड’ में भी आता है। अचानक पूरे गांव की स्मृति चली जाती है और वे एक दूसरे को पहचान ही नहीं पाते। स्मृति लौटने तक पूरे गांव में तमाम तरह के नाटक होते हैं जिसमें हास्य, करुणा और त्रासदी सभी किस्म के भाव उभरते हैं। मार्खेज ने उसका बड़ा रोचक वर्णन किया है।
लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि जब पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, मतदाता परिचय पत्र नहीं है, आधार कार्ड नहीं है, पैन कार्ड नहीं है, जन्म प्रमाण पत्र नहीं है(जिस पर नाम नहीं लिखा होता), हाई स्कूल का सर्टीफिकेट नहीं है तो आखिर कौन सा दस्तावेज भारतीय नागरिकता का प्रमाण है। दरअसल नागरिकता की राजनीति करने वाली पार्टी को भ्रम पैदा करना, लोगों में भय पैदा करना और फिर अहसान करते हुए कोई कागज सौंपना एक परपीड़क किस्म का सुख देता है और राजनीतिक लाभ पैदा करता है। इसलिए विदेश मंत्रालय के बयान से लग गया है कि आने वाले समय में भारत में नागरिकता के दस्तावेज को लेकर भारी उथल पुथल मचने वाली है और लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट काट कर हैरान होने से कोई रोक नहीं सकता। हालांकि सिर्फ पासपोर्ट धारक को भारत का नागरिक मान लेने से भी देश की बड़ी आबादी को परेशानी होती। क्योंकि देश में सिर्फ 9.3 करोड़ से लेकर 10.5 करोड़ यानी 6.5 से 8.7 प्रतिशत लोगों के पास ही भारत का वैध पासपोर्ट है। पासपोर्ट यानी वह पुस्तिका जिस पर अशोक का चिह्न बना है और भारतीय गणराज्य लिखा है और जब भी आप विदेश दौरा करते हैं तो उस पर वीसा का कागज चिपकाया जाता है और आव्रजन की मुहर लगती है। जिसे आप विदेशों में शान से दर्शाते भी हैं।
भारत जैसे प्राचीन देश की नागरिकता कागज पर आधारित होनी नहीं चाहिए बल्कि जन्म के आधार पर स्वाभाविक होनी चाहिए यह बात हमारे संविधान निर्माताओं ने समझ ली थी। हालांकि विभाजन जैसी महात्रासदी के चलते उन्हें इसे निर्धारित करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। संविधान की मसविदा समिति के अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि नागरिकता वाले प्रावधानों ने समिति को काफी सिरदर्दी दी। अनुच्छेद 5 से लेकर अनुच्छेद 11 तक नागरिकता पर चर्चा की गई है और उसे परिभाषित किया गया। उसी के साथ नागरिकता अधिनियम 1955 पारित किया गया और उसमें नागरिकता के मामले में देश में रह रहे मनुष्यों की स्थिति और सरकार के प्रपत्रों के अर्थ को स्पष्ट किया गया। जन्मजात नागरिकता के बारे में यह कानून कहता है कि जिन लोगों का जन्म 1950 और 1987 के बीच भारत में हुआ वे भारत के नागरिक हैं। जिनका जन्म 1987 से 2003 के बीच हुआ उन्हें नागरिकता तब मिलेगी जब उनके माता पिता में से कोई भी जन्म के समय भारतीय नागरिक रहा हो। अगर किसी का जन्म भारत के बाहर होता है लेकिन उसके माता पिता में से कोई एक व्यक्ति भारतीय नागरिक है तो उसे भारतीय नागरिकता प्राप्त होगी लेकिन इसके लिए जन्म के एक साल के भीतर उसे भारतीय वाणिज्य दूतावास में पंजीयन कराना होगा। इसके अलावा भारत में लंबे समय तक लगातार रहने वाले अनिवासी विदेशी नागरिक को भी नागरिकता देने का प्रावधान है। केंद्र सरकार को पास किसी विशिष्ट व्यक्ति को नागरिकता देने का विशेष अधिकार है। दलाई लामा और अदनान सामी जैसे लोगों को इसी प्रावधान के तहत नागरिकता दी गई है।
बिहार में एसआईआर के दौरान दिखाए जाने वाले 11 दस्तावेजों की सूची पर जब मामला सुप्रीम कोर्ट गया तो फैसले में कहा गया कि इन दस्तावेजों में पासपोर्ट और जन्म प्रमाण पत्र के अलावा कोई भी दस्तावेज नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है। नागरिकता का सवाल सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 1960 से पेश आ रहा है। अब्दुल खादिर के मामले में अदालत ने उसे विदेशी नागरिक मानने से इंकार कर दिया जबकि उसके पास पाकिस्तानी पासपोर्ट था। लेकिन 1962 में इजहार खान के मामले में पाकिस्तानी पासपोर्ट धारक को पाकिस्तानी नागरिक माना गया। भारत विभाजन के बाद जैसे जैसे भारत और पाकिस्तान के करीब आने और फिर से एक होने की संभावना समाप्त होने लगी वैसे वैसे नागरिकता की परिभाषा भी संकीर्ण होती गई। अस्सी के दशक में उठे असम आंदोलन ने नागरिकता की परिभाषा को और कठोर व संकीर्ण बनाने की ओर प्रेरित किया। 1955 का नागरिकता अधिनियम उन सभी को भारतीय नागरिक मानता था जो भारत में रह रहे हैं या जिनका जन्म इस धरती पर हुआ है। लेकिन पड़ोसी देशों से लगातार होने वाले युद्धों और देश के भीतर खदबदाती सांप्रदायिक राजनीति ने नागरिकता अधिनियम में छह बार संशोधन करवाया। इनमें 1986, 2003 और 2019 के संशोधन गहरा असर डालने वाले हैं। 2005 में सर्वानंद सोनोवाल के एक मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई अपने को किसी देश का नागरिक बताता है तो नागरिकता साबित करने का दायित्व उसी पर आता है।
नागरिकता पर सबसे अधिक विवाद तो 2019 के सीएए एनआरसी ने पैदा किया और उस पर हुए आंदोलन ने उन कानूनों की अधिसूचना को लंबे समय तक रोक कर रखा।
नागरिकता पर सरकार की ओर से पैदा किए गए भयानक भ्रम की इस स्थिति ने उदारता और समावेशिता पर आधारित भारतीय स्वाधीनता आंदोलन और प्राचीन संस्कृति के विराट दर्शन को संकीर्ण राष्ट्रवाद के दरवाजे पर लाकर पटक दिया है। इसके राजनीतिक नफा नुकसान तो अपनी जगह हैं लेकिन आज पूरा देश आशंका और आत्मसंदेह के वातावरण में जीने को अभिशप्त है। कभी गांधी जी ने कहा था कि अगर समस्त भारतीय धर्मग्रंथ नष्ट हो जाएं और बृहदारण्यक उपनिषद की एक पंक्ति बचे जो कहती है –सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यंति मा कश्चिद् दुःख भा भवेत, तो हमारा काम चल जाएगा। विश्व नागरिकता की बात करने वाले डॉ राम मनोहर लोहिया तो पासपोर्ट और बीसा दोनों का विरोध करते थे। इसीलिए उनके ‘मैनकाइंड’ के संपादकीय बोर्ड के श्रीलंकाई सदस्य किसी भी देश में बिना बीसा पासपोर्ट के घुस जाते थे और फिर निष्कासित किए जाते थे। कागज की मांग जितना किसी देश को जितना पारदर्शिता और वैधानिकता की ओर ले जाती है उतना ही अपने सामान्य नागरिकों के लिए परेशानी पैदा करती है। कभी बस्तर के कलेक्टर रहे और अनुसूचित जाति और जनजाति के आयुक्त डॉ ब्रह्मदेव शर्मा लेखपालों से परेशान आदिवासियों से कहते थे कि जब कोई कागज मांगे या दिखाए तो कह दो कि कागज तुम अपने पास रखो और जमीन तो हमारी है। यानी कागज तुम्हारा जमीन हमारी। दरअसल यही कागज दिखाकर देश की आदिवासी और मूल निवासियों की बड़ी आबादी को विस्थापित किया गया है और उनके जल जंगल और जमीन को छीना गया है।
आज पासपोर्ट, मतदाता परिचय पत्र, आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, परिवार रजिस्टर, जाति प्रमाण पत्र, डिग्री या हाई स्कूल का सर्टीफिकेट कोई दस्तावेज नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है और सरकार ने न तो नागरिकता का कोई कागज जारी किया है और न ही बताया है कि कौन सा कागज इसका अंतिम प्रमाण होगा। ऐसी ही भ्रामक स्थिति के बारे में अमेरिकी राजनीतिशास्त्री मायन वीनर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तकें ‘पॉलिटिक्स आफ स्कैरिसिटी’ और ‘द इंडियन पैराडाक्स’ में कहा है कि इतने अंतरर्विरोधों और अभावों के बावजूद अगर यह देश चल रहा है तो सरकारों के भरोसे नहीं बल्कि भगवान के भरोसे। ऐसे में चाहे अयोध्या के राम मंदिर की लूट हो, मध्य प्रदेश या राजस्थान का भ्रष्टाचार हो या भारतीय जनता की नागरिकता का सवाल हो भारत के लोग अब यही सोच कर बैठे है कि इन सबका न्याय भगवान राम ही करेंगे।
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