— शिवानंद तिवारी —
सन् 1955-56 की बात होगी। डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपनी पत्रिका “जन” में राम इकबाल वरसी को “पीरो का गांधी” कहा था। यह कोई साधारण उपाधि नहीं थी, बल्कि उनके असाधारण साहस, अन्याय के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध और गांधीवादी आचरण की स्वीकृति थी।
घटना पीरो के निकट कुरमुरी क्षेत्र की है। वहाँ एक ऊँची जाति के जमींदार थे। उनके यहाँ कभी मजदूरी करने वाले एक गरीब व्यक्ति ने मिट्टी का घर बनाया था। बरसात में उसकी दीवार गिर गई। जमींदार ने उसे दोबारा दीवार खड़ी करने की अनुमति नहीं दी। यह बात राम इकबाल जी तक पहुँची। वे तत्काल वहाँ पहुँचे और उसी स्थान पर बैठ गए। उन्होंने उस गरीब से कहा—“दीवार खड़ी करो।”
जमींदार और उनके परिवार के लोग आ पहुँचे। उन्होंने राम इकबाल जी के साथ गाली-गलौज की, उन पर पत्थर फेंके, उन्हें डराने-धमकाने की हर कोशिश की। लेकिन वे अडिग रहे। न हटे, न विचलित हुए। अंततः उसी स्थान पर उस गरीब की दीवार फिर से खड़ी करवा दी।
बाद में उसी क्षेत्र के वरिष्ठ समाजवादी नेता केशव शास्त्री ने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। राम इकबाल जी का उत्तर था—“मैं गांधी का प्रयोग कर रहा था।” केशव शास्त्री ने यह पूरी घटना डॉ. लोहिया को लिख भेजी। तभी डॉ. लोहिया ने उन्हें “पीरो का गांधी” कहा।
हम लोगों ने उनके साथ काम किया है। वे सचमुच अपने ढंग के अनोखे व्यक्ति थे। उन्होंने यह दिखाया कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध के कितने प्रभावशाली तरीके हो सकते हैं। डॉ. लोहिया कहा करते थे—“जहाँ अन्याय देखो, उसी क्षण उसका विरोध करो।” राम इकबाल जी ने इस विचार को केवल भाषणों में नहीं रखा, बल्कि अपने जीवन में उतारा। इसके लिए उन्होंने असंख्य कष्ट झेले, मार खाई, मुकदमे झेले, जेल गए; लेकिन कभी पीछे नहीं हटे।
मुझे एक और घटना याद आती है। 1964 में आज के रोहतास जिले के नोखा क्षेत्र में एक भयानक नरसंहार हुआ था। एक ही परिवार के लगभग नौ सदस्य, जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी थे, निर्ममता से मार दिए गए। उस इलाके में गया राय नाम का एक दबंग व्यक्ति था। उसके अत्याचारों के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों की भी हत्याएँ हो रही थीं। एक परिवार के नौ लोग एक मंदिर की छत पर सो रहे थे, रात में सबका गला काट दिया गया। उनमें छोटे बच्चे भी थे। प्रशासन को पहले से तनाव की जानकारी थी, पुलिस भी तैनात थी, फिर भी वह जघन्य घटना हो गई।
उस नरसंहार के विरुद्ध केशव शास्त्री और राम इकबाल वरसी पूरी शक्ति से लड़ते रहे। उन्होंने कभी अपनी जान या सुरक्षा की चिंता नहीं की। समाजवादी पार्टी के अनेक नेता वहाँ पहुँचे। कर्पूरी ठाकुर गए, रामानंद तिवारी गए और अनेक समाजवादी कार्यकर्ता संघर्ष में शामिल हुए। निचली अदालत ने दोषियों को फाँसी की सज़ा सुनाई, जो बाद में उच्च न्यायालय में आजीवन कारावास में बदल गई।
राम इकबाल जी का जीवन ऐसे ही अनगिनत प्रसंगों से भरा पड़ा है। यदि उनके जीवन की सभी घटनाओं को एकत्र किया जाए तो उन पर एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है। बल्कि लिखी जानी चाहिए।
सासाराम लाइट रेलवे, जिसे हम लोग छोटी लाइन कहते थे, उससे जुड़ी एक घटना भी प्रसिद्ध है। रेलवे का नियम था कि यदि डिब्बे में रोशनी न हो तो ट्रेन नहीं चलेगी। एक शाम किसी स्टेशन पर डिब्बे में अंधेरा था। राम इकबाल जी ने गार्ड से शिकायत की। गार्ड ने ध्यान नहीं दिया, कहा, “आगे चलकर ठीक हो जाएगा।”
इतने में गार्ड ने हरी बत्ती दिखा दी और ट्रेन चल पड़ी। जैसे ही गार्ड चलती ट्रेन पर चढ़ने लगा राम इकबाल जी ने पीछे से उनकी कमर पकड़ ली। ट्रेन आगे निकल गई और गार्ड प्लेटफ़ॉर्म पर ही रह गए। आगे आउटर सिग्नल पर चालक ने पीछे देखा तो हरी बत्ती दिखाई नहीं दी। उसने नियम के अनुसार ट्रेन रोक दी। इस प्रकार राम इकबाल जी ने नियमों की अवहेलना का प्रत्यक्ष विरोध किया।
एक और घटना पीरो या कुरमुरी थाने की है। वे किसी काम से थाने गए। वहाँ कोई अधिकारी मौजूद नहीं था। उन्होंने मुकदमों का मुख्य रजिस्टर उठाया और बाहर आकर नुक्कड़ सभा करने लगे। लोगों को दिखाते हुए पुलिस व्यवस्था की लापरवाही पर भाषण देने लगे। थाने वाले असहाय होकर देखते रहे। अंत में उन्होंने एक सिपाही को बग़ैर वर्दी भीड़ में भेजा। जैसे ही राम इकबाल जी ने रजिस्टर ऊपर उठाया, सिपाही झपटकर उसे लेकर भाग गया।
उसी क्षेत्र के ही एक सभा में वे भाषण दे रहे थे। एक दरोगा पुराने वारंट के साथ पहुँचा और बोला, “आपको गिरफ्तार किया जाता है।”
राम इकबाल जी ने शांत भाव से कहा, “ठीक है, चलेंगे। लेकिन पैदल नहीं। सवारी की व्यवस्था करो।”
दरोगा ने कहा, “अब यहाँ हम सवारी कहाँ से लाएँ? मेरी पीठ पर ही सवार हो जाइए. और राम इकबाल जी चट उस दारोग़ा की पीठ पर सवार हो गए।
ऐसी घटनाएँ उनके व्यक्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा थीं। वे अन्याय का विरोध करते थे, लेकिन उसमें हास्य, साहस और नैतिक शक्ति का अद्भुत मेल दिखाई देता था।
एक समय मुझे भी उनके साथ काम करने का अवसर मिला। उनके गाँव में सिंचाई का एक बड़ा आहर था, जिससे दो-चार सौ बीघा भूमि की सिंचाई होती थी। वह नष्ट हो चुका था। उसके पुनर्निर्माण के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता पार्टी के अध्यक्ष सत्येंद्र नारायण सिन्हा भी उनके व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित थे। वे स्वयं उनके गाँव तक गए थे। दोनों की सामाजिक पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व बिल्कुल अलग थे, लेकिन सत्येंद्र बाबू भी राम इकबाल जी के प्रशंसक बन गए थे।
राम इकबाल वरसी केवल स्वयं एक बड़े समाजवादी नेता ही नहीं थे, बल्कि उनमें लोगों की प्रतिभा पहचानने की अद्भुत क्षमता भी थी। उन्होंने अनेक ऐसे लोगों को समाजवादी आंदोलन से जोड़ा, जो आगे चलकर बिहार की राजनीति के महत्वपूर्ण चेहरे बने। कई लोग विधायक बने, कई लोकसभा तक पहुँचे।
उनमें सबसे चर्चित नाम राम अवधेश सिंह का है। राम अवधेश सिंह एम.ए. करने के बाद जमशेदपुर में नौकरी करते थे। संयोग से राम इकबाल जी किसी काम से जमशेदपुर गए। वहीं उनकी मुलाकात राम अवधेश जी से हुई। उन्होंने पूछा, “क्या पढ़े हो?” उत्तर मिला, “एम.ए. पास हूँ।” उन्होंने कुछ लिखने को कहा। लिखावट और विचार देखकर बोले, “तुम अच्छा लिखते हो।” बस, उन्हें अपने साथ ले आए। आगे चलकर राम अवधेश सिंह बिहार के प्रमुख समाजवादी नेताओं में गिने जाने लगे।
इसी प्रकार तुलसी सिंह, जो आगे चलकर मंत्री बने, उनके बारे में कहा जाता है कि वे अपने क्षेत्र में खैनी की छोटी-सी दुकान चलाते थे। राम इकबाल जी उनसे मिले। बातचीत के दौरान उन्हें लगा कि इस व्यक्ति में नेतृत्व की संभावना है। उन्होंने उन्हें भी समाजवादी आंदोलन से जोड़ दिया।
दिनारा के श्री पूजन सिंह, जो बाद में विधायक बने, दिनेश्वर राम जैसे अनेक कार्यकर्ताओं को भी राजनीति में लाने और समाजवादी आंदोलन से जोड़ने का श्रेय राम इकबाल जी को जाता है। यह उनकी विलक्षण क्षमता थी कि वे साधारण लोगों में भी असाधारण संभावनाएँ पहचान लेते थे।
सन् 1968 में वे पीरो विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए और 1972 तक विधायक रहे। किंतु उसके बाद उन्होंने स्वयं चुनावी राजनीति से अलग होने का निर्णय लिया। उनका स्पष्ट कहना था—“एक ही आदमी बार-बार चुनाव क्यों लड़े? नए लोगों को अवसर मिलना चाहिए।”
उस समय वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे। बाद में पार्टी के नेतृत्व और उसके कार्यक्रमों से असंतुष्ट होकर उन्होंने किशन पटनायक, नागभूषण पटनायक तथा अन्य समाजवादी साथियों के साथ मिलकर लोहिया विचार मंच की स्थापना की। मेरा भी उनसे निकट संबंध इसी लोहिया विचार मंच के माध्यम से बना।
आपातकाल के दिनों की एक घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आरा के निकट दुबौली गाँव में रामइकबाल जी ने महेंद्र दूबे के मार्फ़त एक मीटिंग बुलाई। महेंद्र उसी गाँव के थे. बेरोजगार इंजीनियर थे और घनिष्ठता के साथ लोहिया विचार मंच के साथ जुड़े हुए थे। उक्त मीटिंग में नीतीश कुमार सहित अनेक समाजवादी कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था।
लेकिन पुलिस को पहले ही इसकी सूचना मिल गई। जैसे ही लोग बगीचे में एकत्र हुए, पुलिस ने सभी को गिरफ्तार कर लिया और आरा जेल भेज दिया। बाद में उन्हें बक्सर जेल ले जाया जा रहा था। राम इकबाल जी ने इसका प्रतिरोध किया। सभी गिरफ्तार साथियों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और बैठ गए। वे नारे लगाने लगे और जेल ले जाए जाने का विरोध करने लगे। अंततः पुलिस ने बल प्रयोग किया। एक-एक व्यक्ति को मारपीट कर अलग किया गया और सबको बक्सर जेल पहुँचा दिया गया।
बक्सर जेल में राम इकबाल जी को अलग सेल में रखा गया। वहीं जेल अधिकारियों से किसी बात पर उनका गंभीर मतभेद हो गया। विरोध के एक नए और अनोखे तरीके के रूप में उन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और घोषणा कर दी—“मैं किसी का चेहरा नहीं देखूँगा।”
कई दिनों तक वे आँखों पर पट्टी बाँधे रहे। चलते समय कभी गिर जाते, कभी दीवार से टकरा जाते, शरीर पर चोटें आती रहीं। लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। अंततः जेल प्रशासन उनके इस सत्याग्रह के सामने झुक गया। अधिकारियों ने हाथ जोड़कर उनसे अनुरोध किया कि वे पट्टी खोल दें और उनकी माँगें स्वीकार करने का आश्वासन दिया। तब जाकर उन्होंने अपना विरोध समाप्त किया.
राम इकबाल जी ने अपने जीवन में सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह और अहिंसक प्रतिरोध के जितने प्रयोग किए, उतने उदाहरण स्वतंत्र भारत में बहुत कम देखने को मिलते हैं। वे केवल गांधीवादी विचारों की चर्चा नहीं करते थे, बल्कि उन्हें जीवन में उतारकर दिखाते थे।
उनके व्यक्तित्व का एक और प्रसंग उल्लेखनीय है। आंदोलन के आरा के साथी, जो रामइकबाल जी के साथ बक्सर जेल में थे, सुशील तिवारी ने बताया कि जब राम अवधेश सिंह बिक्रमगंज लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े थे, तब उनके प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के उम्मीदवार तपेश्वर सिंह थे, जो सहकारिता आंदोलन का बड़ा नाम माने जाते थे। चुनाव में राम अवधेश सिंह हार गए। उन्होंने चुनाव याचिका दायर की। उस समय व्यापक धारणा थी कि याचिका में उनकी जीत होगी और तपेश्वर सिंह का निर्वाचन निरस्त हो जाएगा।
लेकिन अचानक राम अवधेश सिंह ने अपनी चुनाव याचिका वापस ले ली। उस समय राजनीतिक हलकों में चर्चा फैल गई कि धन के प्रभाव में याचिका वापस ली गई है।
सुशील तिवारी बताते थे कि आरा के यादव छात्रावास के पास से गुजरते समय राम इकबाल जी की नज़र राम अवधेश सिंह पर पड़ी।
उन्हें देखते ही बिना किसी लाग-लपेट के पूछा—“कितना पैसा ले लिए? कितना पैसा लेकर याचिका वापस ले लिया? यह उनका स्वभाव था। जिसे सही समझते थे, उसी क्षण कह देते थे।
राम इकबाल जी का व्यक्तित्व सचमुच विरल था। वे यादव समाज से आए थे, समाजवादी आंदोलन की उपज थे, लेकिन उनके भीतर न कटुता थी, न वैमनस्य। वे अत्यंत उदार, सहज और सरल थे। किंतु सिद्धांतों के मामले में उनका संकल्प इतना दृढ़ था कि पीछे हटना उन्होंने कभी सीखा ही नहीं।
दुर्भाग्य से राम इकबाल जी पर जितना गंभीर शोध और लेखन होना चाहिए था, उतना नहीं हो सका। विक्रमगंज के जगनारायण यादव ने उन पर एक पुस्तक अवश्य लिखी है। पर वह मुख्यतः उनके लेखों और परचों का संकलन है। यदि उन लेखों का भी गंभीर अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि उनकी दृष्टि कितनी व्यापक थी, वे समाज की समस्याओं को कितनी गहराई से समझते थे और उनके समाधान के लिए कितनी मौलिक सोच रखते थे।
मुझे लगता है कि राम इकबाल वरसी के जीवन, संघर्ष, विचार और प्रयोगों पर एक समग्र पुस्तक लिखी जानी चाहिए। वह केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं होगी, बल्कि बिहार के समाजवादी आंदोलन और स्वतंत्र भारत में अहिंसक प्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक गाथा होगी।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

















