समय का साक्ष्य और भाष्य रचता कवि

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— रामप्रकाश कुशवाहा — 

मकालीन शीर्षस्थ हिंदी कवियों में से एक ज्ञानेन्द्रपति का कवि अपनी कविताओं के साथ मूल्यांकन और पहचान के तीसरे दौर में प्रवेश कर गया है। पहला दौर नक्सलबाड़ी आन्दोलन के साथ आलोकधन्वा और अरुण कमल के साथ जोड़कर देखे जाने का था। दूसरा दौर सोवियत रूस के विघटन और शीत-युद्ध की समाप्ति के बाद उत्तर-आधुनिक यथार्थ, भूमंडलीकरण तथा बाजारीकरण का था, तीसरा दौर वाराणसी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र बन जाने का है जो कवि का पहले से ही काव्य-संवेदना का घोषित क्षेत्र रहा है। गंगा-तट  के बाद गंगा-बीती (2019) के माध्यम से कवि ने कवि-कर्म की इस चुनौती को स्वीकार किया है।

 1962  के चीन-युद्ध से आए मोहभंग से पूर्व की नयी कविता नेहरू युग से अभिभूत होने के कारण गैर-राजनीतिक यथार्थ के चित्रण की ओर उन्मुख है। वह समकालीन राजनीतिक यथार्थ की अभिव्यक्ति और उसकी आलोचना से यथासंभव बचती ही है। 62 के बाद की पीढ़ी के धूमिल पहले ऐसे प्रतिनिधि कवि हैं जिनका स्वर मुखर आक्रोश के साथ निर्णायक रूप में राजनीतिक है। धूमिल के बाद व्यवस्था-परिवर्तन के सपने देखने तथा प्रतिबद्धता और सरोकारों के स्तर पर राजनीतिक कविताएँ लिखनेवाली पीढ़ी में ज्ञानेन्द्रपति, आलोकधन्वा और अरुण कमल सर्वाधिक चर्चित त्रयी है।

ज्ञानेन्द्रपति

ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं में निराला और मुक्तिबोध सहित पूरी परंपरा के श्रेष्ठ शिखरों से रचनात्मक प्रतिस्पर्धा मिलती है।यह प्रतिस्पर्धा रचनात्मक चुनौती के रूप में ही अधिक है और प्राय: सर्वोत्तम गुणों के चयन एवं संरक्षण के रूप में है, न कि प्रभाव या अनुकरण के रूप में। कारण यह है कि ज्ञानेंद्रपति अपने वर्ण्य और अभिव्यंजना के साथ पूरी तरह अपने समय को जीने और जाननेवाले कवि हैं। मुक्तिबोध की तरह वे भी अपनी कविताओं में सजग रूप से क्लासिक कविता के रचनात्मक लक्ष्य को पाने का प्रयास करते दीखते हैं। ज्ञानेन्द्रपति सम्पूर्ण वांग्मय या रचना-परम्परा से रचनात्मक प्रतिस्पर्धा करनेवाले कवि हैं। उनके कवि के सामने चुनौती तो मुक्तिबोध और धूमिल द्वारा छोड़े गये यथार्थ को भी हिंदी कविता के दायरे में लाने की है लेकिन देखना यह होगा कि उनका कवि अपने पूर्ववर्तियों और समकालीनों का अतिक्रमण किस सीमा तक कर पाता है।

ज्ञानेन्द्रपति मूलत: दृश्य और दृष्टि-संवेदी कविताओं के संश्लिष्ट  कवि हैं। उनके पास अनुभूतियों और अनुभवों की अत्यंत सशक्त  और कलात्मक भाषा है और उनके कवि के पास एक स्पष्ट मिशनरी नागरिक भूमिका भी  है। अध्ययन और चिंतन से परिष्कृत शोध-पूर्ण जीवन-दृष्टि और प्रातिभ पर्यवेक्षण उनकी कविताओं को विशिष्ट बनाते हैं। उनका कवि एक सर्वव्यापी, परस्पर संवेदी और संवादी मानवीय सूचना-तंत्र का अभिन्न हिस्सा बनना चाहता है। यही कारण है कि उनकी अधिकांश कविताएँ कभी 100 नम्बर पर सत्ता को तो कभी 108 नम्बर पर किसी अस्पताल की एम्बुलेंस को डायल करनेवाले किसी राहगीर के करुणार्द्र बयान की तरह लगती हैं। ज्ञानेन्द्रपति के पास सुमित्रानंदन पंत के बाद सबसे अद्यतन और प्रभावी कविता की चित्र-भाषा है।

ज्ञानेंद्रपति की परवर्ती रचनाधर्मिता ने सोवियत रूस के विघटन और शीत-युद्ध की समाप्ति के बाद भूमंडलीकरण तथा विश्व-बाजारीकरण के दौर में भी अपनी कविता की गवाही दी है। उनका कवि आरंभिक व्यवस्था-विरोध से सभ्यता-विमर्श की ओर गया है। ज्ञान उत्तर-आधुनिक जीवन-बोध, विकास- जनित विनाश तथा नागरिक यथार्थ की त्रासदियों की पड़ताल तक अपने कवि को सतत नागरिक जिम्मेदारी के साथ ले जाते हैं।

ज्ञानेन्द्रपति मुक्तिबोध के बाद हिंदी की अपनी भव्य या शानदार कविता (क्लासिक कविता के अर्थ में)  के इस अर्थ में  एकमात्र कवि लगते हैं कि समय-संधान के साथ अभिव्यक्ति के वैशिष्ट्य के लिए उनका कवि, कविता की समूची परंपरा से भी प्रतिस्पर्धा करता है, ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के उन विरल कवियों में से एक हैं जिन्होंने समकालीन हिन्दी कविता को न सिर्फ विशिष्ट संरचना और कलात्मक पहचान दी है बल्कि  उत्तर-आधुनिक समय की मानवीय चुनौतियों का सामना करने तथा एक सभ्य और संवेदनशील मानवीय समाज की रचना के लिए कविता की सृजनशीलता को लोक की सृजनशीलता तक विस्तार दिया है। ज्ञानेन्द्रपति की कविताएँ विकसित होती मानव-सभ्यता के साथ बदलती मानवीय संवेदना, आत्मीय रिश्तों के स्वरूप, सरोकारों, जरूरतों एवं उसके पर्यावरण की सुरक्षा-संरक्षा की सही समझ रखती हैं।

अपनी कविताओं के विमर्शात्मक चरित्र के कारण वे मार्क्सवादोत्तर उत्तर-आधुनिक समय के भी  सबसे जरूरी एवं प्रासंगिक कवि हैं। उनकी कविताओं में यथार्थबोध के साथ-साथ काल-बोध भी एक आवश्यक आयाम है; संभवत: इसीलिए वे सिर्फ जीवनबोध के ही नहीं, भविष्यबोध के भी कवि हैं। उनकी ‘संशयात्मा’ जैसी पूर्ववर्ती संग्रह की कविताएँ सोवियत संघ के पतन के बाद मार्क्सवादी एवं क्रांतिकामी कवियों में फैली आम कुण्ठा तथा हताशा के विपरीत बेहतर समय-निर्माण की चुनौतियों को नेतृत्वकारी विचारक चिन्ता के साथ गम्भीर-विमर्श के रूप में प्रस्तुत करती रही हैं।

ज्ञानेन्द्रपति पर्यावरण की सम्पूर्ण चिता के कवि हैं- कविताओं में उपस्थित यह पर्यावरण प्रकृति से लेकर मनुष्य तक, सुदूरवर्ती विकास-वंचित गाँव से लेकर प्राचीन और आधुनिक सभ्यता के संरक्षक और वाहक नगरों और महानगरों तक;  इतना ही नहीं, संवेदनात्मक, मानसिक और सांस्कृतिक स्तर तक भी फैला है। हर कविता में कवि एक सम्पूर्ण दृष्टि स्वायत्त करना चाहता है। उसकी दृष्टि संवेदना और विमर्श दोनों पर है। उनकी बहुत-सी कविताएँ एक संवेदनशील गंभीर विचारक का समय-विमर्श हैं। वे समकालीन अव्यवस्था से एक प्रतिबद्ध कवि के मानसिक संघर्ष या मुठभेड़ की तरह हैं, उनकी कविताएँ 1970 के बाद के भारतीय समाज और इतिहास की संवेदनात्मक और वैचारिक पड़ताल प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताएँ  कवि की ओर से एक आदर्श संवेदनशील मानवीय समाज और व्यवस्था की प्रस्तावना की तरह हैं। उनके पास विचारधाराओं की जनपक्षधर सूक्ष्म-विश्लेषक वैज्ञानिक समझ है।

ज्ञानेन्द्रपति ने नागरिक जीवन के संवेदनशील चित्रण के लिए भावानुरूप स्वनिर्मित सामासिक-सांकेतिक शब्द बिम्बों, विशेषणों  वाली जो काव्य-भाषा विकसित की है वह उच्चस्तरीय मनोवैज्ञानिक बौद्धिक आयाम के कारण हिन्दी के किसी और कवि के पास इतनी भव्यता और प्रचुरता से नहीं है। ज्ञानेन्द्रपति का कविता-चिंतन भी अत्यंत समृद्ध एवं बहुआयामी है। कविता की भूमिका, नियति, शिल्प या अभिव्यक्ति की प्रविधि तथा उसका दर्शन भी कवि  की रचना-चिंता का विषय बना है। इस दृष्टि से वे मुक्तिबोध के बाद हिंदी के दूसरे महत्त्वपूर्ण कवि हैं जिन्होंने अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुरूप अत्यंत सजगता के साथ निज की कविता-परिकल्पना का विकास किया है…उनका कवि एकसाथ बीते युग के अनेक काव्य-शिखरों का उत्तराधिकारी और प्रतिस्पर्धी है।

 कविता को पूरी तरह समर्पित ज्ञानेन्द्रपति का अद्यतन काव्य-संग्रह कविता-भविता कविता के आस्तित्विक रहस्य को बोधगम्य बनाने का एक बहुआयामी रचनात्मक प्रयास है। यह कृति मुक्तिबोध की ‘एक साहित्यिक की डायरी’  तथा अज्ञेय की ‘भवन्ती’ और ‘आत्मनेपद’ जैसी कृतियों की परंपरा को आगे बढ़ाती है। इस संग्रह की कविताओं के अध्ययन और विश्लेषण द्वारा न सिर्फ ज्ञानेन्द्रपति की बल्कि समकालीन हिंदी कविता का भी काव्य-शास्त्र रचा जा सकता है। यद्यपि ये कविता को विषय बनाकर लिखी गयी कविताएँ ही हैं जो कविता के बहाने कवि-विमर्श और जीवन-विमर्श तक पाठकों को ले जाती हैं।

‘कविता-भविता’ में संकलित कविताओं के शीर्षकों को देखें तो कविता स्वयं में ही एक कवि की वृहत्तर जीवन-परियोजना की तरह सामने आती है- “कविता की प्रतीक्षा, कविता, एक कविता, कवि, कवि के पास, कवि को चाहिए, जहाँ न जाये रवि, दुनिया को धुनिया चाहिए एक,  त्रिलोचन का एक सानेट, सदुक्ति कर्णामृत, अपनी ही कोई कविता, कोई कविता चमकती है  गयी, नहीं लिखी गयी कविता, एक शब्द का अर्थ कुछ-कुछ अनिश्चित, कविता की भाषा, उभयलिंगी शब्द, बतबुननी बच्ची, तुम्हारे अक्षर, मैं जब जागता हूँ, मेज पर का शंख, शीर्षक कविता का शीश है, शीर्षक की बात, उड़ा ले गयी हवा, शब्दों में जो रोशनी है, मुक्तिबोध से आगे, मन का मौसम, ऐसा होता है, रह-रह कर , कीड़ा, फतिंगा, या शायद कवि, दिनकरी, पेड़ों का पक्ष, जरा बताना, तब भी, जो हो रहा है, हिंदी के लेखक के घर, क वि ता दे, बोधि-बेंच, तुम्हारा काम : कविता का काम, नगरकवि, घंटाकर्ण, अपनी ही प्रतिच्छवि,प्रशस्ति-पत्र, वे, अब, लौटाने की, चूँ-चूँ, राह चलते बाशो के एक हाइकु की याद, मेरा अकेलापन, खाली, आज इस मेरी कलम ने, एक कविता उठाता हूँ, आमंत्रण-पत्र, कवि-कर्म ही न करो, कविता-, न-कुछ, अलविदा में हिलता हाथ’ आदि कविता को लेकर कवि की विविध सूक्ष्म परिदर्शनाएँ इस संग्रह को विशिष्ट बनाती हैं।

इन कविताओं में ज्ञानेन्द्रपति कवि को मितभाषिता की विधा का पथिक कहते हैं। वे कविता के जीवन-काल को मनुष्य के जीवन-काल के समानांतर और अस्तित्व-पर्यंत घोषित करते हैं। उसे जीवन के लिए ज्योति के रूप में देखते हैं– “एक ज्योतित कविता/ जो न जाने कितने अँधेरों से गुजर कर/ लिखी गयी है/ एक हँसमुख कविता/ जिसके वक्ष में/ न जाने कितनी उदासियाँ समायी हैं/ एक छोटी कविता/ जिसकी मितभाषिता में/ मुखर है जिंदगी की बड़ाई।” ( ‘एक कविता’ शीर्षक कविता )

ज्ञानेन्द्रपति ने पद-बिम्बों के स्थान पर शब्द-बिम्बों का जो अन्यतम प्रयोग अपनी कविताओं में किया है, उससे हिंदी कविता और भाषा की अभिव्यक्ति-सामर्थ्य के नये अछूते आयाम उद्घाटित हुए हैं। यह भाषा की परंपरागत सामासिक शक्ति से भिन्न काव्यानुभव प्रदान करनेवाली साहित्यिक घटना ही है। ज्ञानेन्द्रपति अपनी कविताओं के माध्यम से संवेदना का विमर्श प्रस्तुत करनेवाले ऐसे अपरिहार्य कवि के रूप में सामने आते हैं जिनके पास संसार के यथार्थ को देखनेवाली निज के स्वामित्व वाली विशेषज्ञ आँख है और पूरी मौलिक पहचान के साथ वैसी काव्य-दृष्टि और सृष्टि किसी और के पास नहीं।

किताब : कविता-भविता

कवि : ज्ञानेन्द्रपति

प्रकाशक : सेतु प्रकाशन, सी-21, नोएडा सेक्टर-65, पिन-201301

ईमेल- setuprakashan@gmail.com

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