— परिचय दास —
[ दादा धर्माधिकारी का पूरा नाम शंकर त्र्यंबक धर्माधिकारी था। उनका जन्म 18 जून , 1899 को हुआ था और वे विचारक, स्वतंत्रता सेनानी, समाज-सुधारक तथा प्रखर वक्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए। भारतीय सार्वजनिक जीवन में उन्हें स्नेह और सम्मान से “दादा धर्माधिकारी” कहा जाता था। उनके पुत्र चंद्रशेखर धर्माधिकारी भारतीय न्यायपालिका के प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। पौत्र एस सी धर्माधिकारी भी न्यायाधीश रहे हैं।]
दादा धर्माधिकारी को पढ़ते और समझते हुए धीरे-धीरे यह अनुभव होने लगता है कि वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक नैतिक संवेदना का नाम हैं। उनके चिंतन का केंद्र सत्ता नहीं, मनुष्य था। वे जानते थे कि कोई भी व्यवस्था कितनी ही सुंदर क्यों न दिखाई दे, यदि उसके भीतर मनुष्य का सम्मान सुरक्षित नहीं है, तो वह अंततः खोखली सिद्ध होगी। इसीलिए उनके विचारों में बार-बार मनुष्य की गरिमा, आत्मनिर्णय और नैतिक स्वतंत्रता का स्वर सुनाई देता है।
उनकी दृष्टि में लोकतंत्र केवल चुनावों का उत्सव नहीं था। लोकतंत्र उनके लिए एक जीवन-पद्धति था। वह मनुष्य के भीतर संवाद की क्षमता, असहमति को स्वीकार करने का साहस और दूसरे के अस्तित्व के प्रति सम्मान का नाम था। वे मानते थे कि जब समाज में संवाद की जगह शोर ले लेता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे अपनी आत्मा खोने लगता है। इसलिए वे विचारों की स्वतंत्रता को उतना ही महत्त्व देते थे जितना राजनीतिक स्वतंत्रता को।
दादा धर्माधिकारी के चिंतन में ग्राम जीवन का विशेष स्थान है। किंतु उनका ग्राम केवल भौगोलिक इकाई नहीं था। वह मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन का प्रतीक था। वे उस ग्रामीण संस्कृति को महत्त्व देते थे जिसमें श्रम का सम्मान था, समुदाय की भावना थी और जीवन की गति मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप थी। आधुनिकता के अंधे अनुकरण से उत्पन्न संकटों को वे बहुत पहले पहचान चुके थे। उन्हें भय था कि यदि विकास केवल उपभोग और बाजार की शर्तों पर आधारित होगा, तो मनुष्य अपनी आत्मिक संपदा खो देगा।
उनकी लेखनी में प्रकृति के प्रति भी गहरा अनुराग दिखाई देता है। वे प्रकृति को केवल संसाधन नहीं मानते थे। उनके लिए वृक्ष, नदियाँ, पर्वत और खेत मानव सभ्यता के मौन सहयात्री थे। जिस प्रकार एक कवि शब्दों में सौंदर्य खोजता है, उसी प्रकार दादा धर्माधिकारी प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध में नैतिकता खोजते थे। आज जब पर्यावरण संकट पूरी दुनिया के सामने खड़ा है, तब उनके विचार और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।
उनके व्यक्तित्व का सबसे मोहक पक्ष उनकी विनम्रता थी। वे ज्ञान को प्रदर्शन की वस्तु नहीं बनाते थे। उनके भीतर विद्वत्ता थी, पर विद्वत्ता का अहंकार नहीं था। वे सुनना जानते थे। वे प्रश्नों से डरते नहीं थे। उनके लिए प्रश्न शत्रु नहीं, सत्य की ओर ले जाने वाले साथी थे। इसी कारण उनके आसपास संवाद का एक ऐसा वातावरण निर्मित होता था जहाँ विचार स्वतंत्रता से साँस ले सकते थे।
दादा धर्माधिकारी का योगदान भारतीय बौद्धिक परंपरा में इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने नैतिकता को रूढ़ नैतिक उपदेशों से मुक्त किया। उनके लिए नैतिकता किसी बाहरी अनुशासन का नाम नहीं थी। वह मनुष्य के भीतर से उत्पन्न होने वाली जागरूकता थी। जब मनुष्य अपने भीतर दूसरे मनुष्य के दुःख को महसूस करने लगता है, तभी वास्तविक नैतिकता जन्म लेती है। इस दृष्टि से उनका चिंतन करुणा और विवेक का सुंदर समन्वय है।
उनकी वाणी में कविता नहीं थी, फिर भी उसमें काव्य का स्पर्श था। उनके शब्दों में अलंकार कम और अनुभव अधिक था। वे ऐसे वक्ता थे जिनकी बात समाप्त होने के बाद भी श्रोता लंबे समय तक सोचता रहता था। उनका प्रभाव तत्काल उत्तेजना पैदा करने वाला नहीं, बल्कि धीरे-धीरे चेतना में उतरने वाला था। जैसे किसी शांत सरोवर में फेंका गया कंकड़ दूर तक तरंगें उत्पन्न करता है, वैसे ही उनके विचार मन के भीतर दीर्घकालिक कंपन पैदा करते हैं।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक नायक इतिहास की पुस्तकों में बड़े अक्षरों में दर्ज हैं, किंतु कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इतिहास की आत्मा में दर्ज होते हैं। दादा धर्माधिकारी उन्हीं में से एक हैं। वे उन मौन शिल्पियों में थे जिन्होंने स्वतंत्र भारत की नैतिक संरचना को आकार देने का प्रयास किया। उन्होंने समाज को यह स्मरण कराया कि राष्ट्र केवल सीमाओं और संस्थाओं से नहीं बनता, बल्कि उन मूल्यों से बनता है जो लोगों के हृदय में जीवित रहते हैं।
उनका जीवन एक प्रकार का सतत तप था। यह तप किसी आश्रम की एकांत साधना नहीं, बल्कि समाज के बीच रहकर किया गया तप था। उन्होंने विचार को कर्म से अलग नहीं होने दिया। उनकी दृष्टि में सत्य केवल चिंतन का विषय नहीं, जीवन का अभ्यास था। इसी कारण उनका संपूर्ण व्यक्तित्व एक जीवित संदेश की तरह दिखाई देता है।
आज जब सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का स्थान सिकुड़ता हुआ प्रतीत होता है, जब संवाद की जगह आरोप और प्रत्यारोप ने ले ली है, जब मनुष्य की सफलता को उसके चरित्र से अधिक उसकी संपत्ति से आँका जाने लगा है, तब दादा धर्माधिकारी की स्मृति एक नैतिक प्रतिरोध की तरह सामने आती है। वे हमें बताते हैं कि सभ्यता का भविष्य केवल आर्थिक समृद्धि से सुरक्षित नहीं होगा। उसे बचाने के लिए सत्य की आंच, करुणा की नमी और न्याय की रोशनी भी आवश्यक है।
इस अर्थ में दादा धर्माधिकारी कोई बीता हुआ अध्याय नहीं हैं। वे भारतीय चेतना में उपस्थित उस शांत प्रकाश की तरह हैं जो समय के अंधेरों में भी बुझता नहीं। इतिहास की धूल चाहे जितनी जम जाए, ऐसे व्यक्तित्वों की आभा बार-बार दिखाई देती है, क्योंकि वे किसी पद, संस्था या युग के नहीं, बल्कि मनुष्य की श्रेष्ठ संभावनाओं के प्रतिनिधि होते हैं। उनकी विरासत विचारों की विरासत से अधिक एक नैतिक जीवन-दृष्टि की विरासत है, और यही उनकी सबसे बड़ी देन है।
दादा धर्माधिकारी के चिंतन को निम्नलिखित 20 सूत्रों में समझा जा सकता है। ये केवल नारे नहीं, बल्कि उनके व्यापक सामाजिक, नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण के संकेत हैं:
1. मनुष्य किसी भी व्यवस्था से बड़ा है। राज्य, दल और संस्थाएँ मनुष्य के लिए हैं, मनुष्य उनके लिए नहीं।
2. स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक और आत्मिक भी होनी चाहिए।
3. सत्य जीवन का आधार है। बिना सत्य के कोई भी सामाजिक परिवर्तन टिकाऊ नहीं हो सकता।
4. अहिंसा केवल संघर्ष की पद्धति नहीं, जीवन-दृष्टि है।
5. लोकतंत्र मतदान से अधिक संवाद की संस्कृति है।
6. सत्ता का केंद्रीकरण मनुष्य की स्वतंत्रता के लिए खतरा है।
7. गाँव केवल निवास-स्थान नहीं, जीवन-मूल्यों के संरक्षण के केंद्र हैं।
8. श्रम का सम्मान सभ्य समाज की पहली शर्त है।
9. स्त्री और पुरुष समान मानवीय गरिमा के अधिकारी हैं।
10. सामाजिक परिवर्तन कानून से नहीं, चेतना से स्थायी होता है।
11. धर्म का संबंध मनुष्य की आत्मा से है, संप्रदाय से नहीं।
12. जाति-व्यवस्था मनुष्य की गरिमा के विरुद्ध है।
13. संपत्ति का अधिकार सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा होना चाहिए।
14. शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, व्यक्तित्व का विकास है।
15. भोग की अंधी दौड़ मनुष्य को भीतर से रिक्त कर देती है।
16. करुणा के बिना न्याय अधूरा है और न्याय के बिना करुणा निष्प्रभावी।
17. असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है।
18. प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना मानव सभ्यता सुरक्षित नहीं रह सकती।
19. साधनों की शुद्धता साध्य की महानता जितनी ही आवश्यक है।
20. मनुष्य का अंतिम लक्ष्य केवल समृद्धि नहीं, आत्मिक उन्नयन और लोकमंगल है।
इन बीस सूत्रों को समेटकर एक वाक्य में कहा जाए तो दादा धर्माधिकारी का संपूर्ण चिंतन इस विश्वास पर आधारित था कि “मनुष्य की नैतिक स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और करुणामय सह-अस्तित्व ही किसी सभ्य समाज की वास्तविक नींव है।”
विडंबना यह है कि आज दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष यात्राओं और अरबों डॉलर के बाज़ारों पर गर्व करती है, पर दादा धर्माधिकारी के ये साधारण दिखने वाले सूत्र अब भी उतने ही कठिन हैं जितने उनके समय में थे। मनुष्य ने मशीनों को तेज़ बना लिया है; स्वयं को बेहतर बनाना अभी बाकी है।
फोटो आभार : सर्वोदय प्रेस सर्विस
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